स्वामी पुरुषोत्तमानंद एक अग्रणी संन्यासी

स्वामी पुरुषोत्तमानंद एक अग्रणी संन्यासी

भारत में संन्यास की विशिष्ट परंपरा रही। जगत में रहते हुए भी,वैराग्य के मार्ग का चुनाव करने वाले, संन्यासी कहलाते हैं। वे अपना समूचा जीवन, मनुष्य और समाज के निमित्त ही अर्पण करते हैं और दिव्यता की प्राप्ति के लिए भी साधनारत रहते हैं। ऐसे संन्यासियों के पास अपने कई प्रश्न लेकर सामान्य जन भी जाते हैं। संन्यासियों के आध्यात्मिक उपदेश और उनके कृतित्व का अवलोकन कर,मनुष्य मन का कई संदेह दूर हो जाता है।इससे जीवन यात्रा में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। ऐसे ही एक संन्यासी का नाम स्वामी पुरुषोत्तमानंद है,जिनसे अधिसंख्य छात्र,युवा और साधक जन प्रेरणा लेते रहे हैं।

रामकृष्ण-विवेकानंद भावधारा के संन्यासी

स्वामी पुरुषोत्तमानंद रामकृष्ण-विवेकानंद भावधारा के अग्रणी संन्यासी थे। “आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च” के आदर्श को, उन्होंने प्राणपण से साकार करने का प्रयत्न किया। मानव जाति की उन्नति के प्रयास में उन्होंने साहित्य और संगीत का मार्ग चुना। वे कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक रहे। जीवन,धर्म,दर्शन,अध्यात्म,युवाओं और विद्यार्थियों के लिए उन्होंने कई किताबें लिखीं। कन्नड़ भाषा में रामकृष्ण देव और स्वामी विवेकानंद का जीवन चरित भी उन्होंने लिखा। साहित्य के अलावा स्वामी पुरुषोत्तमानंद बेहतरीन गायक थे। संगीत में उनकी अभिरुचि थी। उनके कई भजन संग्रह निकले। श्रोताओ को उनका गायन सुनकर आध्यात्मिक भावानुभूति भी होती है।

वर्ष 1960 में हुए थे दीक्षित

कर्नाटक के दक्षिणी जिले में जन्मे,स्वामी पुरुषोत्तमानंद के बचपन का नाम रामचंद्र था। उन्होंने मैट्रिक तक की शिक्षा प्राप्त की थी। इसके बाद वे अध्यापक बन गए और उडुपी जिले के एक नगर में पढ़ाने लगे। आध्यात्मिक झुकाव उन्हें रामकृष्ण मिशन की ओर खींच लाया। वे रामकृष्ण देव, सारदा मां और स्वामी विवेकानंद के विचारों और कृतित्व से बेहद प्रेरित हुए। इसके बाद उन्होंने आजीवन इन्हीं आदर्शों पर चलने का निर्णय कर लिया। वर्ष 1960 में, बेलूर मठ में,वे ब्रह्मचारी मुकुंद चैतन्य के नाम से,संन्यास के पूर्व परिवीक्षाधीन रहे। लगभग दो साल तक वहां उनका प्रशिक्षण हुआ। उन्होंने रामकृष्ण मिशन के उपाध्यक्ष रहे स्वामी यतीश्वरानंद से दीक्षा ली थी।

रामकृष्ण मिशन केंद्र के बने अध्यक्ष

संन्यास परंपरा में दीक्षित होने के बाद,स्वामी पुरुषोत्तमानंद ने 33 वर्षों तक बैंगलोर स्थित रामकृष्ण केंद्र में सेवाएं दी। वहां उन्होंने स्वामी विवेकानंद बाल और युवक संघ का कुशल संचालन किया। वर्ष 1993 से लेकर वर्ष 2000 तक स्वामी पुरुषोत्तमानंद रामकृष्ण सारदाश्रम केंद्र कोडागु के अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने अनेक आध्यात्मिक समागमों का आयोजन किया और साधु निवास का पुनर्निर्माण भी कराया। वर्ष 2000 के बाद वे रामकृष्ण केंद्र बेलगाम के अध्यक्ष नियुक्त हुए। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1892 में स्वामी विवेकानंद 12 दिनों के लिए बेलगाम में ठहरे थे। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान,स्वामी पुरुषोत्तमानंद ने आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही प्रकल्पों में पर्याप्त योगदान दिया।

साहित्य और संगीत में थी अभिरुचि

साहित्य की ओर अभिरुचि ने ही,उन्हें कन्नड़ भाषा में लेखन की ओर प्रेरित किया। उन्होंने रामकृष्ण देव का जीवन वृत्त लिखा। यह जीवन वृत्त पांच खंडों में प्रकाशित हुआ। उन्होंने कन्नड़ भाषा में,तीन खंडों में स्वामी विवेकानंद की भी जीवनी लिखी है। जीवनी का नाम क्रमशः – वीर संन्यासी, विश्व विजेता और विश्व मानव है। संघ जननी के रूप में प्रतिष्ठित श्री मां सारदा की जीवनी भी उन्होंने लिखी है। उनकी सर्वाधिक चर्चित कृति लेटर टू अ स्टूडेंट् है। यह अंग्रेजी और कन्नड़ दोनों ही भाषाओं में प्रकाशित हुई है। इसके अलावा भी उन्होंने जीवन के विविध विषयों पर, कन्नड़ भाषा में किताबें लिखी हैं। वे संगीतप्रेमी थे। सुमधुर और भावपूर्ण गायक भी थे।भक्तिसुधा,श्री राम आराधना उनके प्रसिद्ध भजन संग्रह है। उनके गायन के श्रवण से मनुष्य को स्थिरता और शांति का अनुभव होता है। संन्यास के गगनमण्डल के इन उज्ज्वल नक्षत्र ने 25 फरवरी 2005 को अपने नश्वर शरीर का त्याग किया। उनके किताबों और गीतों के माध्यम से असंख्य लोग चिरकाल तक प्रेरणा प्राप्त करते रहेंगे ।

 

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