सतेन्द्र नाथ बोस जिन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए

सतेन्द्र नाथ बोस जिन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए

आजाद भारत की,जिस इमारत में हम लोग आज रह रहे हैं उसकी नींव क्रांतिकारियों की कुर्बानी से निर्मित है। इसमें से कई क्रांतिकारी ऐसे रहे हैं जिन्हें उतनी पहचान नहीं मिल पाई जिसके वह हकदार थे। ऐसे ही एक क्रांतिकारी हैं सतेन्द्र नाथ बोसु,जिन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आजादी के इतने साल बाद भी हम सतेन्द्र नाथ बोसु जैसे ही महान क्रांतिकारियों को नहीं जान पाए हैं। उनकी जन्मतिथि पर इस लेख के माध्यम से उनके जीवन पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे।

प्रारंभिक जीवन
सत्येंद्रनाथ का जन्म 30 जुलाई 1882 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में हुआ था। उनके पिता,अभय चरण बोसु,मिदनापुर कॉलेज में प्रोफेसर थे। 1850 के बाद से,वह मिदनापुर में बस गए थे,जो सत्येंद्रनाथ के परिवार का स्थायी निवास बन गया। अभय चरण के पांच बेटे ज्ञानेंद्र नाथ,सत्येंद्र नाथ,भूपेंद्र नाथ,सुबोध कुमार और एक अन्य लड़का और तीन बेटियां थीं। सत्येंद्रनाथ प्रसिद्ध राष्ट्रवादी श्री अरबिंदो के मामा थे, हालांकि वे उम्र में उनसे छोटे थे।

अलीपुर बम केस में हुए गिरफ्तार
उनके बचपन के बारे में बहुत कुछ पता नहीं है,लेकिन पुलिस रिपोर्ट में बोसु का नाम मिदनापुर आर्म्स केस में बिना लाइसेंस के बंदूक रखने के लिए मिलता है,जिसके लिए उन्हें 2 महीने की सजा हुई। क्रांतिकारियों द्वारा मुजफ्फरपुर के दमनकारी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड की हत्या का प्रयास किया गया,जिसके दो दिन बाद, पुलिस ने अनुशीलन समिति के 33 सदस्यों को गिरफ्तार किया और इस मुकदमे को अलीपुर बम केस के नाम से जाना जाता है।

अंग्रेजों के गवाह को ठिकाने लगाने की बनाई योजना
अंग्रेज,अरबिंदो घोष को क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्तता के लिए फांसी देना चाहते थे,लेकिन सबूतों की कमी थी। अलीपुर बम केस में नरेन्द्रनाथ गोस्वामी नामक क्रांतिकारी भी गिरफ्तार हुए थे,जो बाद में सरकारी गवाह बन गए और उन योजनाओं,ठिकाने और सदस्यों की जानकारी के बारे में विवरण देना शुरू कर दिया,जो क्रांतिकारियों के लिए खतरा थे। नरेन्द्रनाथ के खुलासों के कारण कई क्रांतिकारियों की गिरफ्तारियां हुईं।

इसमें प्रमुख रूप से 1908 में चंद्रनगर स्टेशन पर गवर्नर की ट्रेन को उड़ाने के प्रयास में बारिन घोष,शांति घोष और उल्लास्कर दत्ता के नामों को अंग्रेजों को बताया। शहर के महापौर के घर में हुए बम विस्फोट का जिक्र करते हुए नरेन्द्रनाथ ने चंद्रनगर के क्रांतिकारी संगठन के नेता चारु चंद्र रॉय के नाम का उल्लेख किया और 24 जून को क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े अरबिंदो घोष और सुबोध चंद्र मलिक के नामों का उल्लेख किया। बारिन घोष ने जेल से भागने और गद्दार गोस्वामी को मारने की भी योजना बनाई। उन्होंने अपने वकील बी सी रॉय की मदद से जेल के अंदर 2 बंदूकें का प्रबंध किया।

नरेन्द्रनाथ गोस्वामी को दी सजा
नरेंद्रनाथ गोस्वामी को अलीपुर सेंट्रल जेल में यूरोपीय वार्ड में बंद कर दिया गया था, सत्येंद्रनाथ बोसु और कन्हियालाल दत्ता ने गोस्वामी को विश्वास दिलाया कि वे भी गवाह के रूप में बदल रहे हैं और उन्हें जेल अस्पताल में मिलने के लिए कहा। बारिन की योजना के अनुसार बोसु और दत्ता दोनों ने बीमारी का नाटक किया और गोस्वामी को संदेश भेजने से पहले अस्पताल में भर्ती हो गए। 31 अगस्त 1908 को गोस्वामी अस्पताल पहुंचे, बोसु और दत्ता ने उन्हें दूर से गोली मार दी जिससे गोस्वामी घायल हो गए थे। गोस्वामी दौड़े और कन्हैयालाल ने उनका पीछा किया और उन्हें गोली मार दी।

देश के लिए हुए बलिदान
21 अक्टूबर 1908 को अदालत ने कन्हैयालाल को मौत की सजा और बोसु को उम्रकैद की सजा सुनाई। अंग्रेज, जो अरबिंदो पर मुकदमा नहीं चला सके,उन्होंने सत्येंद्रनाथ बोसु की भी मौत की मांग की और सत्र अदालत के न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय का रुख किया,हालांकि जूरी मौत की सजा से सहमत नहीं थी। हाईकोर्ट ने बोसु को भी मौत का आदेश दिया था। 10 नवंबर 1908 को कन्हैयालाल को फांसी दी गई और 21 नवंबर को सत्येंद्रनाथ बोसु को फांसी दे दी गई।

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