प्रकांड विद्वान एवं प्रसिद्ध दार्शनिक गोपीनाथ कविराज

प्रकांड विद्वान एवं प्रसिद्ध दार्शनिक गोपीनाथ कविराज

आज प्रसिद्ध दार्शनिक और संस्कृत विद्वान महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज की पुण्यतिथि है। उन्होंने पूर्व तथा पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान की विशिष्ट चिन्तन पद्धतियों का गहन अनुशीलन कर, दर्शन,संस्कृत और तंत्रशास्त्र के क्षेत्र में महनीय योगदान दिया है। उनकी रचनाओं से मनुष्य जीवन के निर्बाध रूप से आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। कविराज गोपीनाथ केवल वेद-वेदांग,न्याय, सांख्य-योग,बौद्ध धर्म,जैन धर्म समेत विविध दर्शन के ज्ञाता थे।

ढाका के निकट एक गांव में हुआ जन्म

प्रकांड विद्वान गोपीनाथ कविराज का जन्म 7 सितंबर, 1887 को ढाका के समीप धमरई गांव में हुआ। उनके पिताजी का नाम बैकुण्ठनाथ बागची था। बचपन में ही माता-पिता का निधन हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण मामा ने किया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा मधुसूदन ओझा एवं शशिधर के निर्देशन में जयपुर में हुई। कविराज गोपीनाथ ने ढाका, कलकत्ता और वाराणसी में भी शिक्षा प्राप्त की। सर्वत्र उन्हें छात्रवृत्ति मिलती रही। वर्ष 1913 में वाराणसी के क्वींस कॉलेज में,संस्कृत में एम.ए.का अध्ययन करते समय उनका आचार्य नरेंद्र देव से परिचय हुआ था। संस्कृत और अंग्रेजी के प्रति उनकी रुचि आरम्भ से ही थी। जयपुर के प्रवास काल में उन्होंने वहाँ के समृद्ध पुस्तकालयों का भरपूर लाभ उठाया। वर्ष 1914 में विश्वविद्यालय स्थित सरस्वती भवन पुस्तकालय में बतौर लाइब्रेरियन उनकी नियुक्ति हुई।

कई ग्रंथों की रचना की कविराज ने

गोपीनाथ कविराज ने 21 जनवरी 1918 को विशुद्धानंद परमहंस देव से मलदहिया में दीक्षा ली। वे वर्ष 1923 में राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य बने। चौदह वर्षों तक संस्था के प्राचार्य के रूप में सेवा करने के बाद,उन्होंने वर्ष 1937 में स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति ले ली। उन्होंने,संस्कृत योग क्रिया,दर्शन,तंत्रशास्त्र पर आधारित दर्जन भर से अधिक पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों में श्री श्री विशुद्धानन्द प्रसंग,त्रिपुररहस्यम,साहित्य चिंतन इत्यादि प्रमुख है। ग्रंथों के रूप में उनकी अमिट छाप विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन में सहेज कर रखी हुई है।

पदम् विभूषण से हुए सम्मानित

कविराज गोपीनाथ को उनके अतुलनीय योगदान के लिए वर्ष 1964 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। वे साहित्य वाचस्पति, देशिकोत्तम की उपाधि से भी वे सम्मानित हुए। उन्हें वर्ष 1947 में इलाहाबाद और 1956 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट की उपाधि से ससम्मान प्रदान की गई। कविराज गोपीनाथ महामहोपाध्याय कहलाते थे। महामहोपाध्याय एक मानद उपाधि है। इसका अर्थ बहुत बड़े प्रकांड विद्वान से है। यह उपाधि भारत सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। प्राचीन काल में जो विद्वान शास्त्रों से सम्बद्ध विषयों पर ग्रन्थ रचना करते थे,उन्हें महामहोपाध्याय की उपाधि प्रदान की जाती थी। कविराज गोपीनाथ को वर्ष 1934 में यह उपाधि दी गई। विख्यात भारतीय मनीषी कविराज गोपीनाथ का 12 जून 1976 को वाराणसी में निधन हुआ।

 

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