भारत-चीन आर्थिक संबंधों से अनभिज्ञ जनमानस

डॉ. रामेश्वर मिश्र 
डॉ रामेश्वर मिश्र 

बीते 15 जून की रात गलवान घाटी में जो हिंसक झड़प हुई उसने हमारी राष्ट्रीय भावनाओं को झकझोर कर रख दिया और सीमा पर भारत माँ के 20 वीर सपूतों को हमने खो दिया। तब से भारतीय जनमानस के मन-मस्तिष्क में चायनीज सामानों के बहिष्कार का विचार उद्देलित हो रहा हैं। चायनीज सामानों का बहिष्कार भारत के लगभग हर शहरों में हो रहा है और चीनी सामानों की होलियाँ जलाई जा रही हैं जो हमारे राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक बन रही हैं।

आमजन चीनी सामानों का बहिष्कार करके चीन को आर्थिक चोट पहुँचाने को कटिबद्ध हैं। परन्तु इन सब विचरों के बीच एक प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि भारतीय जनमानस द्वारा जो बहिष्कार हो रहा है वह चीनी सामानों का है या चीन का है ? चीनी सामानों का बहिष्कार करना एक अच्छी पहल हो सकती है वरन पूर्णता नही क्योंकि इससे हम चीन को बहुत कम आर्थिक नुकसान पहुँचा पाएंगे।

जनता को समझना होगा कि भारतीय बाजारों में चीनी सामानों की उपलब्धता भारत-चीन आर्थिक समझौतों का प्रतिफल है जिसमें इधर कुछ वर्षों में इजाफा हुआ हैं। और यह हमारे आत्मनिर्भर आर्थिक व्यापार का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी के निर्देशानुसार भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों द्वारा अपने मोबाइल फोन से 52 प्रकार के चयनीज एप का बहिष्कार किया गया जोकि राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत एवं प्रेरित हंै।

भारत-चीन आर्थिक संबंधों से जुड़े तथ्यों पर नजर डालने से स्थिति की भयावहता का स्पष्ट मूल्यांकन किया जा सकता है। वर्ष 2000 से वर्ष 2019 के बीच भारत में कुल चीन का निवेश 2.34 बिलियन डालर रहा। इसमें वर्ष 2000 से 2014 के कुल निवेश केवल 0.5 बिलियन डालर था शेष 1.84 बिलियन डालर महज 05 वर्षों में चीनी निवेश रहा। इसका अभिप्राय यह है कि विगत कुछ वर्षों में हमने अपनी आत्मनिर्भरता चीन के निवेश पर छोड़ रखी है जो कि विश्व के अन्य बड़े देशों जैसे अमेरिका,रूस,जापान आदि के भारत में निवेश के मुकाबले काफी अधिक है।

भारत की चीन पर विभिन्न क्षेत्रों में निर्भरता की बात करे तो पता चलता है कि मोबाइल सेक्टर में 72 प्रतिशत,ऑटो-मोबाइल सेक्टर में 40 प्रतिशत, मेडिसिन सेक्टर में 68 प्रतिशत, ऑटो पार्ट्स के क्षेत्र में 26 प्रतिशत,सोलर पावर में 90 प्रतिशत,टेलीविजन के क्षेत्र में 45 प्रतिशत,टेलिकॉम उपकरण के क्षेत्र में 25 प्रतिशत,इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स के क्षेत्र में 50-60 प्रतिशत के साथ चीन का दबदबा कायम है। एप मार्केट में कुल यूजर में से 66 प्रतिशत यूजर कम से कम एक चीनी एप प्रयोग करते हैं।

गौर हो कि 2016 के बाद से प्रधानमंत्री के नोट बंदी के बाद कैशलेस अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी पेटीएम सेवा में अकेले चीनी कंपनी अलीबाबा की 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी हैं। पेटीएम के संस्थापक विजय शंकर शर्मा की हिस्सेदारी महज 14.67 प्रतिशत है,शेष बचे हिस्से में पाँच और कंपनियां हैं। यह तथ्य सोचने पर मजबूर करता है कि हम किसको आर्थिक लाभ पहुँचा रहे हैं। इसके साथ ही ऑनलाइन शॉपिंग का माध्यम बनी फ्लिपकार्ट में भी चीन की 50 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी हैं। इसके अतिरिक्त बिग-बास्केट,मेक माई ट्रिप,ओयो,क्विकर, स्नैपडील,जोमैटो,स्वीगी,पॉलिसी बाजार,रिविगो,उड़ान आदि कंपनियों में चीन की एक बड़ी हिस्सेदारी हैं। इन सब क्षेत्रों के अतिरिक्त अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जिस पर भारतीय अर्थव्यवस्था एवं जनमानस काफी हद तक निर्भर हैं और ये कंपनियां हमारे रोज के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं जिससे हमारे देश का जनमानस अनभिज्ञ हैं।

भारत के प्रधानमंत्री की चीन यात्राओं की बात की जाय तो 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जी और शी जिनपिंग आपस में 18 बार मिल चुके हैं जबकि 70 सालों में नरेंद्र मोदी ही भारत के ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पाँच बार चीन के दौरे पर गए हैं। पीएम की यात्रा के बाद अक्टूबर 2019 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत की यात्रा की जिसके फलस्वरूप इन यात्राओं और मुलाकातों का परिणाम यह हुआ कि भारतीय व्यापार का वृहद क्षेत्र चीनी निवेश की जद में आता गया। भारत में चायनीज सामानों के साथ साथ भारतीय व्यापार में एक बड़ी हिस्सेदारी चीन द्वारा की जाने लगी। चीन के वुहान शहर में अप्रैल 2018 को चीनी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री की मुलाकात के दौरान भारतीय पीएम के स्वागत में 1982 में आयी फिल्म ए वादा रहा का एक गीत गाया गया था जिसके बोल थे-तु है वही दिल ने जिसे अपना कहा,तु है जहां,मै हूँ वहाँ,अब तो ये जीना,तेरे बिन है सजा। ऐसा लगता है कि इन स्वागत गीत के बोल में ही भारतीय व्यापार की चीनी व्यापार पर निर्भरता छिपी हुई है।

भारत की चीन पर निर्भरता एक क्रमबद्ध चरण का हिस्सा हैं जिसे क्रमबद्ध तरीके से ही तोड़ा जा सकता हैं,पर इसमें समय लगेगा। भारत ने मोबाइल तथा कुछ अन्य क्षेत्रों में अप्रैल 2020 के बाद कुछ सख्त कदम उठाये हैं जो चीनी व्यापार के विस्तार को नियंत्रित करने का एक प्रयास है। भारत द्वारा इसके साथ ही साथ विदेशी निवेश में कुछ शर्तों के साथ-साथ पाबंदियों को लागू करना आज के परिदृश्य में महत्वपूर्ण हो जाता है जिसके द्वारा भी चीनी व्यापार को चोट पहुंचायी जा सकती है। सरकार को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में नियम और शर्तों के सख्त नियम बनाने की जरुरत है,पर भारतीय कंपनियों का हित न प्रभावित हो। भारतीय नागरिक आत्म निर्भर बने और यह निर्भरता स्वदेशी होनी चाहिए जिसके लिए सतत प्रयास की आवश्यकता है और यही प्रयास राष्ट्र के प्रति सच्ची सेवा होगी।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)