अब नए स्वरूप में सामने आएगा ‘जलियांवाला बाग’

 अब नए स्वरूप में सामने आएगा ‘जलियांवाला बाग’

जलियांवाला बाग अब नए स्वरूप में देश के सामने आ रहा है,ताकि हमेशा के लिए जलियांवाला बाग के शहीद देशवासियों की स्मृति में अंकित रहें। गौरतलब हो,अमृतसर का यही वह बाग है, जहां 13 अप्रैल, 1919 की शाम अंग्रेजी सरकार ने भीषण नरसंहार किया था। अंग्रेज सैनिकों ने निहत्थे भारतीयों पर लगातार 10 मिनट तक गोलियां बरसायी थी,जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार शाम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इसी जलियांवाला बाग स्मारक का पुनर्निर्मित परिसर राष्ट्र को समर्पित कर रहे हैं। वे स्मारक में निर्मित संग्रहालय दीर्घाओं का भी उद्घाटन करेंगे। 13 अप्रैल, 1919 को घटित विभिन्न घटनाओं को दर्शाने के लिए एक साउंड एंड लाइट शो की व्यवस्था भी की गई है। परिसर में विकास से जुड़ी कई पहल की गई हैं।

पंजाब की स्थानीय स्थापत्य शैली के अनुरूप धरोहर संबंधी विस्तृत पुनर्निर्माण कार्य किए गए हैं। शहीदी कुएं की मरम्मत की गई है और नवविकसित उत्तम संरचना के साथ इसका पुनर्निर्माण किया गया है। जलियांवाला बाग का केंद्रीय स्थल माने जाने वाले ‘ज्वाला स्मारक’ की मरम्मत करने के साथ-साथ इसका पुनर्निर्माण किया गया है। यहां स्थित तालाब को एक ‘लिली तालाब’ के रूप में फिर से विकसित किया गया है और लोगों को आने-जाने में सुविधा के लिए मार्गों को चौड़ा किया गया है।

अंग्रेजी सरकार की हिंसा और क्रूरता वह रूप भयावह था। कहते हैं कि जलियांवाला बाग में 15 हजार से अधिक लोग इकट्ठा थे। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के अपने सैनिकों को उन पर गोलियां चलाने के आदेश दिए। यह कहा गया है कि अंग्रेज सैनिकों ने कुल 1650 राउंड गोलियां चलाईं,जिससे चारों तरफ लोग मरकर और घायल होकर गिर रहे थे।

अमेरिका में भारत के राजदूत रहे नवतेज सारना के हवाले से रेहान फजल ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है- घटना के वक्त जनरल डायर के साथ खड़े सार्जेंट एंडरसन ने हंटर कमेटी को बताया था कि “जब गोलीबारी शुरू हुई तो पहले तो लगा कि पूरी की पूरी भीड़ जमीन पर धराशाई हो गई है।” उन्होंने आगे लिखा है कि डायर के साथी ब्रिग्स ने उनका हाथ पकड़कर हिलाया, मानो वे यह कह रहे हों कि अब बहुत हो चुका।

इतना ही नहीं,एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी रीहेल ने हंटर कमेटी के सामने गवाही देते हुए कहा था कि ‘हम इस नरसंहार को और देख नहीं पाए तो बाग से बाहर चले आए।’ उस दिन अंग्रेज सैनिकों ने कुल 1,650 राउंड गोलियां चलाईं। बाग के अंदर जिधर-जिधर लोगों की भीड़ भाग रही थी, जनरल डायर अपने सैनिकों को संकेत कर गोलियां चलाने का हुक्म दे रहा था।

जलियांवाला बाग की दीवार पर गोलियों के निशान अब भी मौजूद हैं। यह बात कही जाती है कि उस रात जालियांवाला बाग में घायल हुए लोगों को कोई डॉक्टरी सहायता नहीं पहुंची। न ही लोगों को अपने मृतकों और घायलों को मैदान से बाहर ले जाने की अनुमति दी गई।

ब्रिटिश सरकार ने जलियांवाला बाग नरसंहार को छिपाने की भरपूर कोशिश की थी। लेकिन जब बात फैलने लगी तो उसने एक जांच कमेटी (हंटर कमेटी) गठित कर दी और मामले को दबाने की हर संभव कोशिश की। अपनी रिपोर्ट में हंटर कमेटी ने इस बात को स्वीकार किया कि फायरिंग के दौरान 379 लोग मारे गए, जिनमें 337 पुरुष और 41 बच्चे शामिल थे।

हालांकि, डायर ने कहा था कि करीब 200 लोग मारे गए। जबकि प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से किश्वर देसाई ने कहा है, “कई प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कम से कम हजार लोगों की मौत हुई, जबकि चार से पांच हजार लोग घायल हुए।” ‘पार्टीशन म्यूजियम’ ने इस घटना का काफी अध्ययन कर फाइलों की जांच की है, जिसमें 502 मरने वालों के नाम निकाले गए हैं।

इस नरसंहार की सूचना मिलने के बाद रवींद्रनाथ ठाकुर ने वायसराय चेम्सफोर्ड को पत्र लिखकर अपनी नाइटहुड की उपाधि वापस कर दी थी। महात्मा गांधी ने भी घटना का तीखा विरोध किया था। नरसंहार की इस घटना ने भारतीय नागरिकों और अंग्रेजों के बीच निश्चित दूरी बना दी थी।

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