नेताओ ! जरा आंख में भर लो पानी

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बृजेंद्र पटेल, सीनियर जर्नलिस्ट

आगरा। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौर में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश की स्थापना करा दी और पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को आत्म समर्पण के लिए मजबूर कर दिया था। इस पर तत्कालीन जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को दुर्गा की उपमा दी थी। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में कांग्रेस सरकार ने विपक्षी दल भाजपा संसदीय दल के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को यूएनओ में भारत का पक्ष रखने भेजा।

प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव के कार्यकाल में कांग्रेस सरकार ने लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में कश्मीर मसले पर यूएनओ में पाकिस्तान को जवाब देने के लिए दल भेजा था। विेदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद उस दल में बतौर सदस्य शामिल थे।अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में पोखरन परमाणु परीक्षण पर कई देशों ने भारत पर पाबंदी लगा दी तो पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल के सांसद इंद्रकुमार गुजराल को कई देशों में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा गया।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वर्ण मंदिर में आपरेशन ब्ल्यू स्टार करने से पहले पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता चरण सिंह से मशविरा करती हैं और उसके बाद ने कैबिनेट की बैठक में सैन्य कार्रवाई के लिए आदेश देती हैं। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को समूचा देश आज भी पूजता है क्योंकि उनके कार्यकाल में साल 1965 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को धूल चटाई थी।

हार के लिए नेहरू को किसी ने नहीं किया जलील

कुछ ऐसी घटनाएं हैं जिनके कारण भारतीय लोकतंत्र दुनिया में मजबूती के तौर पर पहचाना जाता है। जगजाहिर है कि साल 1962 में भारतीय सेना सीमित संसाधनों के कारण चीन के हाथों पराजय का घूंट पीने को मजबूर हुआ था पर संसद में डाॅ.राममनोहर लोहिया के एकलौते भाषण को छोड़ दें तो देश की जनता ने दिंवगत नेहरूजी को इसके लिए इतना कभी जलील नहीं किया,जितना बीते छह सालों में किया गया।

आज भारतीय लोकतंत्र जिस मुहाने पर खड़ा है,उसमें सत्ता पक्ष हर वक्त विपक्ष के प्रति नफरत की आग उगलता रहता है। गोया वे एक दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंदी न होकर दुश्मन हों। अब माहौल भी ऐसा है कि मीडिया के एक वर्ग की सोच भी हर समस्या के लिए विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने की बन गई। लगातार हमले झेल रहे विपक्ष खासकर कांग्रेस के तेवर तल्ख हो गए हैं। ऐसे माहौल में भाजपा और कांग्रेस के नेता लोकतांत्रिक परंपराओं और सामान्य शिष्टाचार को भूलकर अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी कर रहे हैं।

शिष्टाचार की लाज रखनी चाहिए थी प्रधानमंत्री जी

मैं मानता हूं इसकी शुरूआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। जब वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आ गए थे तो उन्हें अपनी भाषा में नम्रता और कम से कम पूर्व प्रधानमंत्रियों के प्रति सम्मानजनक भाव का प्रदर्शन करना चाहिए था। किंतु उन्होंने जो किया, पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया। नरेंद्र मोदी ने जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से लेकर डाॅ.मनमोहन सिंह तक को संसद के अंदर और संसद के बाहर आरोपित किया। वे देेश की मौजूदा हर समस्या के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हैं। संसद में तो डाॅ.मनमोहन सिंह की ईमानदारी को बाथरुमें रेनकेट पहनकर नहाने जैसी संज्ञा देकर सदन को शर्मसार कर दिया।

प्रधामनंत्री को डरपोक बताना निंदनीय

उधर देश की सीमा पर चीन के अतिक्रमण के मुद्दे पर कांग्रेस का रवैया हैरान कर देने वाला है। इसकी कतई उम्मीद न थी। माना भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीेते छह साल में लोकतंत्र में शिष्टाचार की सारी हदे पार कीं और विपक्षी को हर मौके पर लतियाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पर जब बात देश की आती है तो सियासी मतभेद और कहासुनी को अनदेखा किया जाता है। किंतु राहुल गांधी,प्रधानमंत्री के प्रति अशोभनीय टिप्पणी में यह कह गए कि मोदी जी बाहर निकलो,डरो नहीं,देश की सीमा पर चीन कितना घुस आया है। हम तुम्हारे साथ हैं…। राहुल गांधी का यह बर्ताव दर्शाता है कि उनके मन में प्रधानमंत्री पद के प्रति सम्मान का भाव नही है। गोया दुनिया वालो जान लो,हमारा प्रधानमंत्री कितना डरपोक है जो चीनी सैनिकों के पराक्रम के डर के मारे मांद के माफिक सात रेसकोर्स में छिपा बैठा है। यह निंदनीय टिप्पणी है जो यह भी यह दर्शाता है कि राहुल गांधी अभी प्रधानमंत्री के पद के लिए परिपक्व नहीं हैं।

जब नहीं उठे पीएम

बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल का संसद के अंदर कई मौकों पर अपमान किया। याद है जब श्री राहुल गांधी खुद लोकसभा में प्रधानमंत्री की सीट पर जाकर उनसे गले मिलने गए थे तो नरेंद्र मोदी अपनी सीट से खड़े नहीं हुए थे और राहुल गांधी ने झुककर उन्हें लगे लगाया था। कई दीगर मौकों पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी पर आपत्तिजनक तंज कसे। राहुल जी,इसका मतलब यह नहीं कि आप अपमान की आग में देश के प्रधानमंत्री को दुनिया के सामने डरपोक ठहराओ।

संसद में अपमान की आग

राहुल गांधी के इस बर्ताव को कांग्रेस के एक सांसद के तौर पर हम अनदेखा कर भी सकते हैं। किंतु कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में जो कहा, उसमें उनका देश में एकता का भाव तो दिखा नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने का भाव जरूर परिलक्षित हुआ। सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री द्वारा सर्वदलीय बैठक देर से बुलाये जाने का आरोप मायने नहीं रखता है। कतई नहीं। प्रधानमंत्री इसके लिए बाध्य भी नहीं हैं। प्रधानमंत्री को जब उपयुक्त अवसर मिला,उन्होंने सर्वदलीय बैठक बुला ली। इसमें हर्ज क्या है ? यदि सोनिया गांधी को लगता था कि उनके पास चीन सीमा विवाद के संबंध में देश में हिंत में कोई सलाह है तो खुद सात रेसकोर्स या साउथ ब्लाक चली जातीं,किसने रोका था भाई ?

लोकतंत्र की नसीहतें ध्वस्त

कांग्रेस और भाजपा के बीच इस कड़वाहट ने इंदिरा,राजीव,पीवी नरसिंहाराव और अटल सरकार की तमाम परंपराओं की नजीरों को ध्वस्त कर दिया। सोनिया गांधी का सर्वदलीय बैठक में कह देना हैरान करने वाला है कि कांग्रेस भारतीय सेना के साथ है। बेहतर होता कि वे कहतीं,कांग्रेस अपने देश की सरकार और प्रधानमंत्री के साथ हैं। उन्होंने सेना के साथ होने का शब्द बोलकर दुनिया को संदेश दिया कि भारत का विपक्ष खासकर कांग्रेस,चीन चीन सीमा विवाद पर पूरी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रवैये से सहमत नहीं है और उनके साथ नहीं है। यहां सोनिया गांधी को समझना चाहिए था कि जिस भारतीय सेना के साथ होने की बात कर रही हैं,वह देश की सीमा पर भारत सरकार और प्रधानमंत्री के आदेश पर मोर्चा ले रही है। आप सेना को आदेश देने वाले के साथ नहीं हो,सेना के साथ हो ? सेना मोर्चे पर लड़े या नहीं,यह सरकार तय करती है न कि सेना खुद।

इससे यह भी जाहिर होता है कि सोनिया गांधी देश की सशक्त लोकतंत्र को कमजोर करने की चेष्टा कर रही हैं। उनका सरकार और प्रधानमंत्री को अनदेखा कर सीधे सेना का साथ देने का वक्तव्य इशारा करता है कि उनकी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आस्था नहीं है और ऐसे में उनका यह कदम देश की सेना को हुकूमत से हटकर जनता से सीधा संवाद संपर्क का रास्ता खोलने के माफिक है। यदि सोनिया गांधी का यही इरादा है तो यह खतरनाक है।

जैसे को तैसा की नीति

देश की आंतरिक राजनीतिक कलह रक्षा और विदेश जैसे मसलों पर जगजाहिर हो गई है। यह खुद को दुनिया का सबसे मजबूत लोकतंत्र होने का दम भरने वाले भारत के लिए शर्मनाक है। मैं अब तक सत्तारुढ भाजपा को उसके उग्र तेवर और विपक्ष पर बेवजह हमलावर होने का आरोप लगाता रहा हूं। अब लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व भी इन हमलों में आपा खो चुका है। कांग्रेस ने मुल्क में अर्से तक हुकूमत की है और सत्ता चलाने का उसके पास भाजपा से ज्यादा अनुभव है। लिहाजा ऐसे में कांग्रेस से ज्यादा गंभीरता और समझदारी के साथ बड़ा दिल दिखाने की उम्मीद थी। यदि कांग्रेस भी जैसे को तैसा, आचरण करती है तो दोनेां में फर्क क्या रह जाता है ? आप लोग सोचा।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)