महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल 

महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल 

“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमान,
हम अभी से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है ”

ओज से भरी इस पंक्ति ने हजारों नौजवानों को, मातृभूमि के दीवानों को देश की स्वतंत्रता के लिए न्यौछावर होने की प्रेरणा दी। इस पंक्ति के उद्धृतकर्ता और महान स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल की आज जयंती है। उन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए न्यौछावर कर दिया और सदा के लिए भारतवासियों को ऋणी बना गए। यह बात सत्य है कि,कोई भी राष्ट्र संरचनाओं से महान नहीं बनता है। त्याग,समर्पण और निष्ठा के साथ किए गए प्रयासों और कार्यों से ही,राष्ट्र के सुदृढ़ भवितव्य की निर्मिति होती है। हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने भी अपने बलिदान से स्वतंत्र भारत के महान लक्ष्य को प्राप्त किया और विश्व के सबसे प्राचीन राष्ट्र को गौरवशाली सिंहासन पर आरूढ़ कर दिया। आइये, मातृभूमि की बलिवेदी पर प्राणपुष्प अर्पित करने वाले रामप्रसाद बिस्मिल की जीवन यात्रा का परिचय पाते हैं।

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे बिस्मिल

रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ। उनके पिता का नाम मुरलीधर और मां का नाम मूलमती था। रामप्रसाद बिस्मिल बेहद साधारण कृषक परिवार में जन्मे थे। उनके जीवन का यही पक्ष उन्हें औरों से अलग बनाता है। साधारण कृषक परिवार में जन्म लेकर अपनी मेधा,प्रतिभा,देशभक्ति और बलिदान से वे असंख्य व्यक्तियों के श्रद्धा पात्र हो गए हैं। रामप्रसाद बिस्मिल की प्रारंभिक शिक्षा पिता के सानिध्य में घर पर हुई। बाद में उर्दू पढ़ने के लिए वे एक मौलवी साहब के पास गए। अंग्रेजी से उन्होंने आठवीं कक्षा उत्तीर्ण की। रामप्रसाद बिस्मिल जब नौवीं कक्षा में थे,तब वे आर्य समाज के संपर्क में आए। स्वामी दयानंद सरस्वती की रचना सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर उनमें काफी परिवर्तन आया। इस किताब के सहारे ही, उन्हें किशोरावस्था के कुछेक दुर्गुणों से भी विमुक्त होने में सहायता मिली। उन्हें वैदिक धर्म को जानने का अवसर प्राप्त हुआ। किताब से उनके जीवन में नये विचारों और विश्वासों का जन्म हुआ। उन्हें एक नया जीवन मिला। उन्हें सत्य,संयम, ब्रह्मचर्य का महत्व आदि समझ में आया। रामप्रसाद बिस्मिल ने अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का प्रण किया। इसके लिए अपनी पूरी जीवनचर्या ही बदल डाली।

बिस्मिल के व्यक्तित्व पर मां का प्रभाव

रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन पर सबसे अधिक उनकी मां का प्रभाव पड़ा। उनकी माता मूलमती यूं तो अशिक्षित थी,पर विवाहोपरांत उन्होंने प्रयत्न से हिंदी पढ़ना सीख लिया। वे एक अत्यंत धार्मिक, सदाचारी,कर्तव्यपरायण और देशभक्त महिला थी। उन्होंने अपने बच्चों को भी यही शिक्षा दी। रामप्रसाद बिस्मिल अपनी आत्मकथा में लिखते हैं – “मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है, कि तुमने किस प्रकार अपनी देववाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है। तुम्हारी दया से ही,मैं देश सेवा में संलग्न हो सका। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैंने ग्रहण की उसका श्रेय तुम्हीं को है। यदि मुझे ऐसी माता न मिलती,तो मैं भी अतिसाधारण मनुष्यों की भांति,संसार चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता।” बिस्मिल के उक्त कथन से ही हम यह अनुमान लगा सकते हैं,कि उनके जीवन को गढ़ने में उनकी माता का कितना अनथक योगदान था।

ऐसे हुआ क्रांतिकारी जीवन का सूत्रपात

आर्य समाज के सदस्य और देशभक्त भाई परमानंद की गिरफ्तारी और फांसी की सजा होने की खबर ने रामप्रसाद बिस्मिल को झकझोर दिया। उनके भीतर स्वतंत्रता की ज्वाला भड़क उठी। इसके बाद से ही उन्होंने विदेशी ताकत को उखाड़ फेंकने का निश्चय कर लिया। मैनपुरी षड्यंत्र केस के प्रसिद्ध क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित से,पंडित राम प्रसाद बिस्मिल काफी प्रभावित हुए। बिस्मिल व दीक्षित दोनों ने मैनपुरी,इटावा,आगरा व शाहजहांपुर आदि जिलों में गुपचुप अभियान चलाया और युवकों को देश की आन पर मर मिटने के लिए संगठित किया। इन्हीं दिनों उन्होंने ‘देशवासियों के नाम संदेश’ नाम का एक पत्र प्रकाशित किया और उसे अपनी ‘मैनपुरी की प्रतिज्ञा’ शीर्षक कविता के साथ युवकों को बांटा।

काकोरी के नायक रहे बिस्मिल

भारत के स्वतंत्रता संग्राम इतिहास में काकोरी की घटना बेहद महत्वपूर्ण है। इस घटना के बाद भारतीय जनमानस, स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए, क्रांतिकारियों की ओर आशा भरी दृष्टि से देखने लगा। क्रांतिकारियों का उद्देश्य ट्रेन से शासकीय खजाना लूटकर,उन पैसों से हथियार खरीदना था,ताकि अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध को मजबूती मिल सके। राम प्रसाद बिस्मिल ने 9 अगस्त 1925 को चंद्रशेखर आजाद सहित अपने नौ साथियों के साथ,डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर पर शाहजहांपुर में सवार हुए। चेन खींचकर रेलगाड़ी को रोका गया और खजाना लूटा गया। इस कार्य में उनके साथ अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी,चन्द्रशेखर आजाद,शचीन्द्रनाथ बख्शी,मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल,केशव चक्रवर्ती, मुरारी शर्मा तथा बनवारी लाल शामिल थे। काकोरी कांड के बाद ब्रिटिश सरकार बेहद गंभीर हो गई और गहन छान-बीन करवाई गई। जांच के बाद यह सिद्ध हो गया कि,यह क्रांतिकारियों की योजना थी। देशभर से 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 26 सितंबर 1925 को बिस्मिल भी गिरफ्तार कर लिए गए।

बिस्मिल का अंतिम प्रयाण

रामप्रसाद बिस्मिल को गिरफ्तार करने के बाद गोरखपुर जेल में कुछ दिनों तक रखा गया। महीनों तक मुकदमा चला। अंततः उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। फांसी से पहले इस वीर सपूत ने अपनी मां को पत्र लिखा। एक पत्र उन्होंने अपने सबसे प्रिय मित्र अशफाक उल्ला खां को भी लिखा। बिस्मिल को 19 दिसम्बर 1927 को फांसी हुई। उससे पूर्व, सुबह वे स्नान कर तैयार हुए। फांसी के फंदे के समीप पहुंचे। जब रामप्रसाद बिस्मिल से उनकी अंतिम इच्छा के विषय में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि, ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वनाश। इसके बाद उन्होंने वैदिक मंत्रों का पाठ किया। भारतमाता की जय और हिंदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाया। देश की स्वतंत्रता के लिए वीर रामप्रसाद बिस्मिल ने फांसी के फंदे को चूम लिया। उनके बलिदान का समाचार समूचे देश में फैल गया। फूलों की चादर ओढ़े बिस्मिल के शव का अंतिम संस्कार किया गया। जब उनके मौत की सूचना उनकी मां को मिली, तो उन्होंने कहा, “मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु पर प्रसन्न हूँ, दुःखी नहीं। मैं श्री रामचन्द्र जैसा ही पुत्र चाहती थी। वैसा ही मेरा राम था। बोलो श्री रामचन्द्र की जय!” उनकी माता का यह कथन उस दौर के प्रमुख समाचार पत्रों में छपा।

मिसाल थी रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां की दोस्ती

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां की दोस्ती बेहद प्रसिद्ध थी। दोनों बेहद अच्छी शायरी और गजल भी लिखते थे। स्वयं रामप्रसाद बिस्मिल बेहतरीन रचनाकार थे। बेहद प्रसिद्ध मेरा रंग दे बसंती चोला नामक गीत उन्होंने ही लिखा था। महज तीस वर्ष के जीवन काल में उन्होंने 11 से भी अधिक किताबें लिखीं। अशफाक उल्ला खां भी “हसरत” के उपनाम से शायरियां लिखते थे। दोनों एक दूसरे को अपनी रचनाएं सुनाते। स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर भी साझा विचार रखने वाले दोनों क्रांतिकारियों ने, देश के लिए प्राणों की आहुति दे दी। बिस्मिल की फांसी के चंद दिनों बाद ही अशफाक उल्ला खां को भी फांसी दे दी गई। देशभक्तों की ये दोस्ती सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया।

कृतज्ञ राष्ट्र का रामप्रसाद बिस्मिल को प्रणाम

रामप्रसाद बिस्मिल की जयंती पर आज देशभर में कई आयोजन किए जा रहे हैं। बिस्मिल की जयंती पर उनके जन्मस्थान शाहजहांपुर में कार्यक्रम आयोजित किया गया। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत भी, महान सेनानियों का पुण्य स्मरण किया जा रहा है। रामप्रसाद बिस्मिल की जीवन यात्रा पढ़कर देश के नागरिकों के मन में कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है और वे भारतमाता के इस महान सपूत के समक्ष प्रणवत हो जाते हैं। रामप्रसाद बिस्मिल का त्याग, सदियों तक जन्मभूमि की रक्षा के लिए, सर्वस्व अर्पित करने की प्रेरणा देता रहेगा। उनके बलिदान की गाथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गई है।

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