उज्जैन का प्रसिद्ध नागचंद्रेश्वर मंदिर

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागदेव के अनेक मंदिर हैं,इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का,यह उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है।

इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।नागपंचमी 25 जुलाई को है। 24 जुलाई की रात 12 बजे महानिर्वाणी अखाड़े के महंत गर्भगृह का ताला खोल कर भगवान नागचंद्रेश्वर महादेव की पूजा अर्चना करेंगे। लेकिन इस बार कोरोना के प्रकोप के कारण नागचंद्रेश्वर मंदिर में नागपंचमी पर श्रद्धालु दर्शन के लिए नहीं जा पाएंगे। श्रद्धालुओं के लिए दूसरे माले पर स्थित ओंकारेश्वर मंदिर के पास एलईडी पर दर्शन कराने की व्यवस्था की जाएगी।

पौराणिक मान्यता 

सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया। लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत:वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है।

यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए।

माना जाता है कि तीन नागदेव प्रमुख हैं वासुकि, शेष और तक्षक। वासुकी नाग का स्थान प्रयाग में है। शेष नाग समुद्र में भगवान विष्णु की सेवा में रहते हैं। तक्षक ने महादेव की तपस्या कर यह वरदान ले लिया है कि वे शिव के सान्निध्य में रहेंगे।महाकाल के साथ नागचंद्रेश्वर भी यहां विराजित हैं। तक्षक की प्रकृति एकांत है, इसलिए उन्हें एकांत दिया है। वर्ष में केवल एक बार वे दर्शन के लिए प्रकट होते हैं। यह अद्भुत प्रतिमा केवल नागचंद्रेश्वर मंदिर परिसर में ही है।इस दिन नागचंद्रेश्वर में दर्शन का महत्व है। कोरोना के चलते प्रवेश बंद है।

नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है,इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।एजेंसी