प्रदेशफिरोजाबाद

लोहा पीटा: प्रतिज्ञा तोड़कर आगे बढ़ने का समय

गाड़िया लोहार’ एक ऐसा समुदाय जिसकी गाड़ी ही उसका घर है। इनकी सजी-धजी गाडि़यां इनकी पहचान हैं। इन्हीं गाड़ी के चक्कों में इनके घर-परिवार के लगातार चलते रहने की कील लगी है। इसी कील में कहीं बरसों पुरानी प्रतिज्ञा आज भी बंधी है।

फ़िरोज़ाबाद। दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में लगभग चालीस हजार गाड़िया लोहार रहते हैं। राजस्थांन के अलावा उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश आदि राज्यों में भी इनके डेरे सड़क किनारे लगे देखे जा सकते हैं। सड़क किनारे लोहे के औजार बनाना ही इनका मुख्य पेशा है,यही इनकी रोजी-रोटी का साधन भी है। इनको गाड़िया लोहार,लोहा पीटा,बंजारे आदि नामों से भी जाना जाता है। यह समुदाय आर्थिक तंगी से जूझ रहा है.गाड़ियां लोहारों के पूर्वज महाराणा की ही सेना में थे।महाराणा प्रताप की प्रतिज्ञा से बंधे ये लोग अब चाहते हैं कि इनके बच्चे भी व्यवस्था में शामिल हों और अपना भविष्य संवारें। बच्चों के भविष्य की खातिर अगर पुरानी परंपराएं तोड़नी पड़ें,तो पुरखे नाराज नहीं होते,बल्कि आशीष बनकर बरसते हैं।

प्रतिज्ञा के मूल में एक लंबी कथा सांस लेती है। इसमें गहन दुख,आक्रोश,हिम्मत और भविष्य की सुखद आस एक साथ महसूस होती है। यह अपने वर्तमान का प्रतिरोध भी हो सकती है और एक सुंदर सपने की परिकल्पना भी। ऐसी ही एक प्रतिज्ञा गाड़िया लोहारों ने भी ली थी। जो समय के साथ और इस्पाती होती गई। पर अब लगता है कि महाराणा के वंशजों के लिए प्रतिज्ञा तोड़ने का सही समय आ गया है। वे पढ़ रहे हैं, बढ़ रहे हैं और अपने डेरे के स्थायी होने का सपना भी देख रहे हैं।गाड़िया लोहार’ एक ऐसा समुदाय जिसकी गाड़ी ही उसका घर है। इनकी सजी-धजी गाडि़यां इनकी पहचान हैं। इन्हीं गाड़ी के चक्कों में इनके घर-परिवार के लगातार चलते रहने की कील लगी है। इसी कील में कहीं बरसों पुरानी प्रतिज्ञा आज भी बंधी है।

आखिर क्या़ थी वह प्रतिज्ञा

बात तब की है जब सोलहवीं शताब्दी में महाराणा प्रताप का मुगलों से संघर्ष चल रहा था। गाडि़या लोहारों के पूर्वज महाराणा की ही सेना में थे। मुगलों से संघर्ष में महाराणा की हार हुई और इनका राज्य मेवाड़ मुगलों के हाथ चला गया।हारे हुए महाराणा की सेना के इन्हीं इस्पाती जवानों ने कसम खाई कि जब तक मेवाड़ और चित्तौड़ पर फिर से महाराणा प्रताप सिंह सिसौदिया का राज नहीं हो जाता तब तक वे अपने घर मेवाड़ नहीं लौटेंगे। बस तभी से ये चल रहे हैं।

दशकों बीते,शताब्दियां बीतीं पर इन्होंने प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। यही प्रतिज्ञा इनके समुदाय की पहचान बन गई है। वे गाड़ी में अपनी गृहस्थी जमाते हैं और निकल पड़ते हैं अनजान राह की ओर। राजस्थान के मेवाड़ से निकले गाड़िया लोहार अब देश के कई राज्यों तक पहुंच गए हैं। इस सफर में लोहे को अपने मनोनुकूल आकार में ढालने का इनका हुनर इनके साथ है।पहले जहां ये महाराणा प्रताप की सेना के लिए हथियार बनाया करते हैं,वहीं अब ये बदलते समय के साथ घर और खेतों में काम आने वाला लोहे का सामान बनाकर बेचते हैं। तवा,कड़ाही, चिमटा से लेकर फावड़ा,छैनी,हथौड़ा भी। समय की धूल,धूप,आंधी, बारिश में भी इनका हुनर ही इनके सिर की छत और पांव तले की जमीन रहा।अपनी गाड़ी में अपनी गृहस्थी लेकर चलते  गाड़िया लोहार अब देश भर में फैल गए हैं।

मूलत: राजस्थात के मेवाड़ के रहने वाले इस समुदाय के लोग राजस्थान के अब हर जिले में मौजूद हैं। इनके ज्यादातर डेरे गांवों के बाहर लगते हैं। इसकी वजह है कि यह अन्य किसी समुदाय के साथ मेलजोल ज्यादा पसंद नहीं करते हैं। इनका खानपान और रिश्तेदारियां भी अपने ही समुदाय में होती हैं। अब भी इनकी भाषा मेवाड़ की ही महक लिए हुए है। पहनावा और पारीवारिक ढांचा अब भी वही है। जीवनशैली के हिसाब से इन्हें घुमंतू समुदाय की श्रेणी में रखा गया है। अनुसूचित जनजाति में शामिल न होने के कारण अभी भी इनके कल्याण के लिए उस तरह के प्रयास नहीं किए जा सके हैं,जैसे आदिम और जनजातीय समुदायों के लिए होते रहे हैं।

शताब्दियों पुराना इनका व्यवसाय इनके लिए दो वक्त की रोटी भी बहुत मुश्किल से जुटा पाता है। इनके माता-पिता इसके लिए दिन भर कड़ी मशक्कत करते हैं। अपनी उम्र तक पहुंचते बच्चे भी लोहा पीटने का हुनर सीख लेते हैं। तपते लोहे के बीच इनका बचपन कहीं कुम्हला जाता है। ये पोषण और शिक्षा दोनों से ही वंचित रह जाते हैं। राजस्थांन के अलावा उसके साथ लगते राज्यों में भी इनके डेरे सड़क किनारे लगे देखे जा सकते हैं। हरियाणा,पंजाब,उत्तर प्रदेश के साथ ही दिल्लीं में भी इनकी अच्छी तादाद है। समय बदलने के साथ ही ऐसे बहुत से लोग हैं जो इनके कल्याण के लिए आगे आए हैं।

 

 

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