‘गहरे समुद्र अभियान’ को स्वीकृति,जानें 

‘गहरे समुद्र अभियान’ को स्वीकृति,जानें 

नई दिल्ली। हिमालय और चांद को फतह करने के बाद इंसान अब समंदर की गहराइयों को जीतने निकला है। हां, वे समंदर, जो जिंदगी से लबरेज हैं और जिनकी गहराइयां रहस्यों से भरी हुई हैं अब उम्मीद है जल्द ही इंसानों के सामने उजागर हो जाए। इंसान जो ब्रह्मांड के हर रहस्य को जानकर मानव सभ्यता को उन्नति के नित नए शिखर पर पहुंचाना चाहता है,अब समंदर को जीतकर सभ्यता के विकास के सफर में एक नया,सुनहरा अध्याय जोड़ने को है। इस अध्याय को लिखने के लिए अब भारत ने भी अपंने हिस्से की कलम थाम ली है। कल भारत ने ‘गहरे समुद्र अभियान’ (डीप ओसियन मिशन) को मंजूरी दे दी है।

भारत के पास है दुनिया को नई राह दिखाने का मौका

हम जानते हैं की पृथ्वी की 71% सतह पर समंदरों का राज है। जानकार कहते हैं कि समंदरों के नीचे अथाह संसाधन और अपार संभावनाएं फैली पड़ी हैं। मानव अभी तक सिर्फ समुद्र के 5% हिस्से को ही जान पाया है। 95% हिस्से में समुद्रों के ना जाने कितने राज है जो अभी तक रहस्य बने हुए हैं। इन्हीं रहस्यों और संभावनाओं के समंदर में अब भारत ने डूबकी लगाने का निश्चय किया है। इसी के साथ भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो ऐसी ही संभावनाओं के लिए समुद्र को खंगाल रहे हैं। उम्मीद है भारत जल्द ही ऐसे मोतियों को लेकर आएगा,जो समूची सभ्यता के लिए नए मार्ग प्रशस्त करेंगे।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मिली मंजूरी

बुधवार को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की समिति ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के प्रस्ताव ‘गहरे समुद्र अभियान’ को स्वीकृति प्रदान कर दी है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य समुद्र में संसाधनों की खोज और महासागरीय संसाधनों के सतत उपयोग के लिए गहरे समुद्र प्रौद्योगिकियों को विकसित करना है।

अभियान का बजट
इस अभियान को चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए 5 वर्ष की अवधि की अनुमानित लागत 4,077 करोड़ रुपए होगी। आपको बता दें, 3 वर्षों (2021-2024) के लिए पहले चरण की अनुमानित लागत 2823.4 करोड़ रुपये होगी। गहरे समुद्र परियोजना, भारत सरकार की नील अर्थव्यवस्था ( ब्लू इकोनोमी) पहल का समर्थन करने के लिए एक मिशन आधारित परियोजना होगी। वहीं,पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओइएस) इस बहु-संस्थागत महत्वाकांक्षी अभियान को लागू करने वाला नोडल मंत्रालय होगा।

आपको बता दें, फरवरी 2019 में प्रतिपादित किए गए भारत सरकार के 2030 तक के नए भारत के विकास की अवधारणा के दस प्रमुख आयामों में से नील अर्थव्यवस्था भी एक प्रमुख आयाम है।
केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा कि मिशन के तहत समुद्र में 6,000 मीटर गहराई में खनिजों का अध्ययन किया जाएगा। जलवायु परिवर्तन के कारण देखे गए परिवर्तनों पर भी नजर रखी जाएगी। उन्होंने कहा कि मिशन के तहत अधिक गहरे समुद्र में जैव विविधता पर एक अध्ययन किया जाएगा और समुद्री जीव विज्ञान के लिए एक उन्नत समुद्री स्टेशन स्थापित किया जाएगा। इसके अलावा,एक अपतटीय तापीय ऊर्जा केंद्र भी होगा, जो नए उभरते क्षेत्रों की मदद करेगा।

इन बिंदुओं पर होगा मुख्यत: ध्यान

i. गहरे समुद्र में खनन और मानवयुक्त पनडुब्बी के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास: तीन लोगों को समुद्र में 6,000 मीटर की गहराई तक ले जाने के लिए वैज्ञानिक सेंसर और उपकरणों के साथ एक मानवयुक्त पनडुब्बी विकसित की जाएगी। बहुत कम देशों ने यह क्षमता हासिल की है। मध्य हिंद महासागर में 6,000 मीटर गहराई से पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स के खनन के लिए एक एकीकृत खनन प्रणाली भी विकसित की जाएगी। भविष्य में संयुक्त राष्ट्र के संगठन इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी के द्वारा वाणिज्यिक खनन कोड तैयार किए जाने के बाद,खनिजों के अन्वेषण अध्ययन से निकट भविष्य में वाणिज्यिक दोहन का मार्ग प्रशस्त होगा।

ii. महासागर जलवायु परिवर्तन सलाहकार सेवाओं का विकास: इस मिशन के तहत के एक केंद्र स्थापित किया जाएगा,जो जलवायु परिवर्तन में होने वाले बदलाव पर नजर रखेगा। जलवायु परिवर्तन के लगातार अध्ययन से भविष्य में इससे होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान लगा पाएंगे।

iii. गहरे समुद्र में जैव विविधता की खोज और संरक्षण के लिए तकनीकी नवाचार: सूक्ष्म जीवों सहित गहरे समुद्र की वनस्पतियों और जीवों की जैव-पूर्वेक्षण और गहरे समुद्र में जैव-संसाधनों के सतत उपयोग पर अध्ययन किया जाएगा। यह घटक नील अर्थव्यवस्था के प्राथमिकता वाले क्षेत्र समुद्री मात्स्यिकी और संबद्ध सेवाओं को मदद प्रदान करेगा।

iv. गहरे समुद्र में सर्वेक्षण और अन्वेषण: इस घटक का प्राथमिक उद्देश्य हिंद महासागर के मध्य-महासागरीय भागों के साथ बहु-धातु हाइड्रोथर्मल सल्फाइड खनिज के संभावित स्थलों का पता लगाना और उनकी पहचान करना है। यह घटक नील अर्थव्यवस्था के प्राथमिकता वाले क्षेत्र गहरे समुद्र में महासागरीय संसाधनों की खोज में मदद करेगा।

v. महासागर से ऊर्जा और मीठा पानी के लिए भी अनुसंधान किया जाएगा। अपतटीय महासागर थर्मल ऊर्जा रूपांतरण (ओटीईसी) विलवणीकरण (desalination) संयंत्र के लिए अध्ययन और विस्तृत इंजीनियरिंग डिजाइन इस अवधारणा को आगे ले जाने में मदद करेंगे। यह घटक नील अर्थव्यवस्था के प्राथमिकता वाले क्षेत्र अपतटीय ऊर्जा विकास में मदद करेगा।

vi. महासागर जीवविज्ञान के लिए उन्नत समुद्री स्टेशनः इस घटक का उद्देश्य महासागरीय जीव विज्ञान और इंजीनियरिंग में मानव क्षमता और उद्यम का विकास करना है। यह घटक ऑन-साइट बिजनेस इन्क्यूबेटर सुविधाओं के माध्यम से अनुसंधान को औद्योगिक प्रयोग और उत्पाद विकास में परिवर्तित करेगा। यह घटक नील अर्थव्यवस्था के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों जैसे महासागर जीव विज्ञान,नील व्यापार और नील विनिर्माण में मदद प्रदान करेगा।

कैसे बनते हैं समुद्र में खनिज

धरती की टेक्नोनिक प्लेट से निकलने वाली गर्मी की वजह से समुद्र के नीचे पानी गर्म होकर सुराखों से निकलता है। यह पानी जिन चट्टानों से होकर गुजरता है, उनमें मौजूद खनिजों को खुरचता चलता है। इसी वजह से समुद्र की तलहटी में खनिज के भंडार जमा होने लगते हैं।

खनिजों को निकालना आसान नहीं है

ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे के पॉल लस्टी कहते हैं कि समुद्र की गहराई में जमा खनिज की तलाश आसान काम नहीं। जब इन सुराखों से गर्म पानी निकलता है, तो उसमें से खनिज के अवशेष नहीं मिलते, और जब गर्म पानी निकलना बंद हो जाता है, तो भी इन सुराखों के मुहाने पर ऐसी चीजें नहीं जमा होतीं कि पता लग सके कि कहां खनिज के कितने भंडार हैं। समुद्र की गहराई का माहौल बेहद चुनौतीभरा होता है। तीन से चार हजार मीटर की गहराई में खुदाई करना आसान काम नहीं है। पहले तो इन खनिजों के भंडारों का पता लगाना होगा फिर,इन्हें निकालने की जुगत भिड़ानी होगी। इसके लिए हमें नई तकनीक चाहिए होगी।

समुद्री जीवों को नुकसान न पहुंचाना होगी चुनौती

वैज्ञानिक समुद्र की गहराई में खुदाई को लेकर संशय में हैं। वो कहते हैं कि इससे गहरे समुद्र में रहने वाले जीवों को खतरा हो सकता है। उनके पूरे इकोसिस्टम पर इसका प्रभाव पड़ेगा। इसलिए, समुद्र की तलहटी के इकोसिस्टम को पूरी तरह समझे बिना खुदाई से भारी नुकसान भी हो सकता है। समुद्र विज्ञानी मानते हैं कि जिन सोतों से गर्म पानी निकलना बंद हो चुका है, उनमें भी जिंदगियां आबाद होती हैं। गहरे समुद्र में खुदाई की वजह से कंकड़-पत्थर का गुबार उठने का डर है। इससे समुद्री जीवों की जान पर बन आएगी,फिर चौबीसों घंटे खुदाई चलने से वहां की लाइफ-साइकिल में भी खलल पड़ेगा।

वहीं दूसरी ओर कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र के इकोसिस्टम के इस नुकसान को दूसरे तरीके से देखने की जरूरत है। वो मानते हैं,समुद्र में खुदाई से प्रदूषण कम होगा। आज धरती पर गहरी खदानों से खनिज निकालने में जितनी ऊर्जा खर्च होती है,उसके मुकाबले समुद्र की खुदाई से पर्यावरण का प्रदूषण करीब एक चौथाई तक कम हो जाएगा। धरती के मुकाबले समंदर से निकलने वाले खनिज की गुणवत्ता भी बेहतर होगी।

भारत की समुद्री स्थिति

दुनिया में भारत की समुद्री स्थिति अद्वितीय है। भारत के तीन किनारे महासागरों से घिरे हैं और देश की लगभग 30 प्रतिशत आबादी इन्हीं तटीय क्षेत्रों में रहती है। कुल 7,517 किमी लंबी तटरेखा पर भारत के नौ तटीय राज्यों और 1,382 द्वीपों का आवास है। इसी के मद्देनजर, देश के लिए हिंद महासागर क्षेत्र के रणनीतिक महत्व को देखते हुए,यह मिशन, भारत को दक्षिण एशिया क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने में मदद करेगा।

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