लाॅकडाउन से महत्वपूर्ण परिवर्तन की ओर कृषि अर्थव्यवस्था

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अगर हम अर्थव्यवस्था की बात करे तो सभी उद्योगों,कारखानों और हर तरह के कारोबारों में काम की बंदी का प्रभाव देखने को मिला। इस काम बंदी का सीधा प्रभाव कृषि अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल रहा है।

आगरा (डॉ.के.पी.सिंह)।” किसानों व कृषि मजदूरों पर लाॅकडाउन का प्रभाव ” विषय पर किये गये समाजशास्त्रीय अध्ययन में यह बात निकलकर आई है कि लाॅकडाउन के प्रभावों के कारण कृषि अर्थव्यवस्था में परिवर्तन हो रहा है।

इस अध्ययन में निम्नलिखित परिवर्तन सामने आये हैं :

कृषि मजदूरों की मजदूरी की दर में गिरावट

गेहूँ और जौ की फसलों की कटाई लाॅकडाउन के दौरान ही हुई है। इस वर्ष आवागमन बंद होने के कारण मशीनों से कटाई की जगह हाथ से कटाई का कृषि क्षेत्रफल बहुत बढ गया है। सामान्यतः इन फसलों की कटाई का भुगतान मजदूरों को गेहूँ या जौ की तय मात्रा देकर किया जाता है। पिछले चार पाँच वर्षों से यह मजदूरी की दर तीन से साढे तीन मन गेहूँ प्रति बीघा चल रही थी। लेकिन इस वर्ष 2020 में इसमें एक मन तक की कमी आई है। यानी एक बीघा की कटाई के लिए केवल दो से ढाई मन गेहूँ का मजदूरी भुगतान खेत मालिकों द्वारा किया गया है।

शहरों से पलायन कर पहुँचे मजदूरों ने कम मजदूरी पर किया खेतों में काम

शहरों में रहकर मजदूरी करने वाले मजदूरों के लिए शहरों में लाॅकडाउन के कारण काम नही था । उन मजदूरों ने अपने पैत्रिक गाँवो की ओर पलायन किया अथवा जो मजदूर रोजाना दिहाडी मजदूरी के लिए शहर आते थे उन्होंने गाँवों में ही रहकर फसलों की कटाई का काम किया है। इस अध्ययन में आश्चर्यजनक रूप से यह बात भी सामने आई है कि अनुसूचित जाति वर्ग के मजदूरों ने शहरों से अपने गाँवों में जाकर कृषि मजदूरी का काम किया जो कि उनके द्वारा परंपरागत तौर पर पिछले चार पाँच वर्षों से कृषि कार्य नहीं किया जा रहा था।

खेतों की भेज ( किराये ) में भी आई है गिरावट

खेती के प्रकारों में भेज यानी किराये पर खेती करना भूमिहीन किसानों,मझौले किसानों व कृषि मजदूरों के लिए आजीविका का बहुत बडा साधन है। पिछले वर्षों की तुलना में दो से पाँच हजार रुपये प्रति बीघा भेज की दर में कमी आई है। इसका प्रमुख कारण यह रहा है कि किसान अपनी फसलों को नगद भुगतान पर नहीं बेच पाया और सब्जी,फलों व फूलों की फसल को शहरों में आवागमन बंद हो जाने के कारण सब्जी मंडी तक लेकर नहीं जा पा रहा है। उसे सस्ते दामों पर गाँवों में ही बेचने को मजबूर होना पड़ा । उत्पादन अधिक और माँग में कमी के कारण सब्जी,फलों व फूलों की फसलें खेतों में ही खराब हो जाने के कारण किसान लागत मूल्य भी नहीं निकाल पा रहा है।

खेत मालिकों में भविष्य को लेकर भय एवं अनिश्चितता की स्थिति बन गई है। परम्परागत तौर पर खेत किराये पर लेकर कृषि करने वाले घाटे की वजह से कम मूल्य पर ही खेती करने की स्थिति में हैं। कुछ किसान स्वयं भी अपने खेतों को कम भेज पर देने के इच्छुक हैं। क्योंकि वो स्वयं खेती कर कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहते हैं।

अगले दो से तीन वर्षों तक यही स्थिति बने रहने की है संभावना

इस अध्ययन की समाप्ति तक गाँवों में कुछ प्रवासी मजदूर पहुँचा है । उनके गाँवों में पहुँचने के बाद कृषि मजदूरों की संख्या बढ जाने के कारण यह संभावना अधिक है कि वह मजदूर शहरों में वापस जाने के बजाय गाँवों में अपनी आजीविका कृषि क्षेत्र में ही निर्धारित करे । खेती को कुछ शर्तों के साथ इकट्ठा दो अथवा तीन बर्षों के लिए भेज पर करने की अधिक संभावना है।

प्रवासी मजदूरों के वापस लौटने की संभावना बहुत कम। औधोगिक क्षेत्रों में मजदूरों की कमी का खडा हो सकता है संकट

लाॅकडाउन के कारण बदले सामाजिक व आर्थिक परिदृश्य में औधोगिक क्षेत्र की इकाइयों में काम शुरू होने के बावजूद मजदूरों की कमी आ सकती है। क्योंकि अपने घर से अधिक दूरी के क्षेत्रों में प्रवासी मजदूरों के वापस लौटने की संभावना बहुत कम है। मनोवैज्ञानिक तौर पर 30 से 40 प्रतिशत पलायन करने वाले प्रवासी मजदूरों को सामान्य स्थिति में आने में एक से दो बर्ष तक का समय लगेगा।

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