निवेश में छलांग लगाने से पहले करें सोच-विचार

Jayant Pai, CFP, Head- Products

लेखक: जयंत पई – सीएफपी. हेड-प्रोडक्‍ट्स, PPFAS  Mutual Funds .

इन दिनों मैंने गौर किया है कि आबादी का एक हिस्सा सलाहकारों को दरकिनार करके खुद ही फाइनेंशियल प्लानिंग प्रक्रिया का पूरा बीड़ा उठाने में बड़ी दिलचस्पी ले रहा है। इसका एक कारण तो यह है कि टीवी और प्रिंट मीडिया में पर्सनल फाइनेंस से जुड़ी सामग्री की बाढ़ आ गई है, और दूसरा, सलाहकारों का मुखौटा पहनकर काम करने वाले एजेंटों के चलते उन्हें या उनके परिचितों को खराब अनुभव हुए हैं।

हालांकि, कुछ लोग इस प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए कहते हैं कि यह दवा पर कुछ लेख पढ़ने के बाद स्व-चिकित्सा करने के समान है, लेकिन मेरा मानना है कि यह प्रवृत्ति अपने आप में खराब नहीं है और दरअसल आने वाले समय में तकनीक तथा सूचनाओं के प्रसार के चलते और बढ़ सकती है।

बहरहाल, यदि आपको लगता है कि आप पेशेवर सलाहकारों के समान ही अच्छे हैं, तो यह महत्वपूर्ण है कि आप केवल उथले पानी में ही हाथ-पैर न चलाते रहें। ऐसा इसलिए क्योंकि चक्कर में डालने वाली अहम चीजें विवरणों में छुपी होती हैं, अत: कुछ बारीकियों के बारे में जागरूकता मायने रखती है।

इसलिए ऐसा प्रयास करने वाले तमाम लोगों के लिए यहां कुछ ऐसे मोटे और बारीक तथ्‍य हैं, जिनके बारे में हो सकता है कि आपको जानकारी न हो। अगर आपको जानकारी है, तब भी उन पर फिर से गौर करना अच्छा होगा, क्योंकि पर्सनल फाइनेंस नया जामा पहनाने के बजाय मजबूत बनाने के बारे में है :

आप इसे खुद ही क्यों करना चाहते हैं? इस कोशिश से पहले दो बार सोचें। ऐसा केवल तभी करें जब आपको विश्वास हो कि आप सक्षम हैं, इसलिए नहीं कि आप अपने वर्तमान सलाहकार से निराश हैं या उनकी फीस देने से बचना चाहते हैं। याद रखें कि एक खराब ढंग से बनाई या अमल में लाई गई योजना दीर्घकालिक में आपको तगड़े आर्थिक नुकसान की वजह बन सकती है।

लक्ष्यों से निर्धारित होते हैं आपके निवेश: योजना का नाता प्रक्रिया से ज्यादा है और उत्पादों से कम। इसलिए, पहले अपने लक्ष्यों को संक्षेप में लिखें, समय के हिसाब से उनकी श्रेणियां बनाएं और प्राथमिकता के अनुसार उन्हें क्रम दें। फिर आपको उचित लक्ष्य के साथ उचित निवेश का मेल करना चाहिए, ताकि निराशा की गुंजाइश कम से कम हो।

मिसाल के लिए, यदि आप जून 2020 में अपने बच्चे की स्कूल फीस का भुगतान करने का इरादा रखते हैं और अगले एक साल में इक्विटी म्यूचुअल फंड व स्टॉक-मार्केट मूव्स में निवेश का विकल्प चुनते हैं, तो आपको अंतत: तंगी का सामना करना पड़ सकता है। बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट या छोटी अवधि के डेट फंड्स जैसे साधन एक साल के भीतर लक्ष्य को निश्चित आकार देने के लिए ज्यादा उपयुक्त होते हैं, क्योंकि वे इक्विटी फंड्स की तुलना में कम अस्थिर होते हैं। इसी तरह इक्विटी फंड्स किसी ऐसे लक्ष्य को पूरा करने के लिए अधिक उपयुक्त हो सकते हैं जो पांच साल दूर है, क्योंकि वक्त के साथ उनकी अस्थिरता का असर कम हो जाता है और उनमें निश्चित आय उत्पादों से बेहतर रिटर्न उत्पन्न करने की संभावना होती है। याद रखें कि मूल रूप से कोई भी निवेश अच्छा या बुरा नहीं होता है, लेकिन अगर वह आपके लक्ष्यों के साथ उचित ढंग से तालमेल में न हो तो निश्चित तौर पर आपके लिए अनुपयुक्त हो सकता है।

यह सिर्फ निवेश की बात नहीं है: फाइनेंशियल प्लानिंग के समूचे ढांचे में निवेश सिर्फ एक हिस्सा है। एक समग्र योजना बनाने के लिए आप नकदी प्रवाह प्रबंधन, बीमा, परिसंपत्ति की योजना आदि जैसी अन्य समान रूप से अत्यावश्यक दरकारों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं।

जरूरी हो तो मदद लें: अपने आत्मविश्वास के बावजूद हमें अपनी योजना के कुछ पहलुओं के लिए वकीलों सरीखे पेशेवरों की मदद लेने के लिए तैयार रहना चाहिए।

समय-समय पर इसकी समीक्षा करें: वित्तीय योजना एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। इसलिए एक अच्छी तरह से तैयार और अमल में लाई गई योजना बहुत जरूरी तो है, लेकिन सफलता के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है। उम्मीद से कम प्रदर्शन करने वाले उत्पादों (और जिनकी उपयोगिता समाप्त हो गई है) को हटाने के लिए समय-समय पर समीक्षा करना और लेखा-जोखा रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, वित्तीय परिदृश्य में विभिन्न बदलावों के बीच खुद को बदलते रहना भी अहम है।

कुछ अन्य उपयोगी छोटी-छोटी बातें:
1. ब्याज दर की सुर्खी के मोह में न पड़ें: डेट साधनों में निवेश करते समय टैक्स और मुद्रास्फीति को ध्यान में रखें और फिर टैक्स कटौती तथा मुद्रास्फीति-समायोजन के बाद की स्थिति के आधार पर विभिन्न विकल्पों की तुलना करें।

इसके अलावा, आजकल कुछ बैंक बचत खातों पर अपेक्षाकृत ज्यादा ब्याज दर की पेशकश कर रहे हैं। उनका चयन करने से पहले बारीक अक्षरों में छपी सूचनाओं को ध्यान से पढ़ें, क्योंकि उनमें कुछ सीमित करने वाली शर्तें भी हो सकती हैं, जिन पर आपका वर्तमान बैंक जोर नहीं दे रहा होगा।

2. “पर्याप्त” बीमा खरीदें: जीवन बीमा खरीदते समय केवल सामान्य नियमों (जैसे आपकी आय के दस गुना के बराबर बीमा) पर ही निर्भर न रहें, बल्कि अपनी मौजूदा बिक्री योग्य संपत्ति के मूल्य को भी ध्यान में रखें। अन्यथा मुमकिन है कि आप जरूरत से ज्यादा बीमा करवा लें। यह करीब-करीब उतना ही बुरा है, जितना कम बीमा लेना।

इसके अलावा, बेनेफिट पॉलिसीज के विपरीत, एक ही जोखिम को कवर करने के लिए विभिन्न बीमा कंपनियों से कई रीइम्बर्स्मेंट पॉलिसीज (स्वास्थ्य, घरेलू सामग्री) खरीदने की जरूरत नहीं है, क्योंकि “कॉन्ट्रीब्यूशन क्लॉज” यह सुनिश्चित करेगा कि जब भी आप दावा करें तो अत्यधिक लाभ न उठा पाएं।

3. फंड मैनेजर की निवेश प्रक्रिया के आपके मूल्यांकन, घोषित मैंडेट के अनुपालन और बाजार चक्र में जोखिम-समायोजित प्रदर्शन के आधार पर म्यूचुअल फंड्स का चयन करें। स्कीम्स की तुलना करते समय यह ध्यान रखें कि समान विशेषताओं वाली स्कीम्स के बीच तुलना करनी है। किसी स्कीम को सम्मान स्वरूप मिले सितारों की संख्या देखकर ही न बह जाएं, न ही उसके हालिया प्रदर्शन को ही सबकुछ मान लें।

ये केवल कुछ बिंदु हैं, लेकिन अगर आप आगे आने वाले कामों को लेकर अभी से परेशान महसूस कर रहे हैं, तो बेहतर होगा कि किसी प्रतिष्ठित सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर को नियुक्त करें और यह सारा काम उसे सौंप दें।

अस्वीकरण: ये लेखक की निजी राय है।

 

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