मतपेटी में बंद हुई कई तकदीरें

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Mumbai/मीरा भायंदर/ शैलेन्द्र पांडे –

21 अक्टूबर को शांतिपूर्ण तरीके से मीरा भायंदर में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुआ और 145 विधानसभा के तीन महत्वपूर्ण प्रत्याशियों की तकदीरें मतपेटी में दर्ज हुई। 24 अक्टूबर को चुनाव परिणाम सामने आएंगे और साथ ही साथ सभी अटकलों पर पूर्णविराम लग जायेगा।

हालाँकि सभी प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे है पर जिस तरह से चुनाव देने 50 प्रतिशत लोग भी नही पहुँचे उससे यह स्थिती तो साफ है कि सभी राजनीतिक विश्लेषकों की गुणा गणित में काफ़ी बदलाव देखने को मिल सकता है।

145 विधानसभा क्षेत्र पर सिर्फ महाराष्ट्र ही नही अपितु दिल्ली की भी नज़र लगातार रही और यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता राजनाथ सिंह, पीयूष गोयल, केशव प्रसाद मौर्य, रवि किशन, मनोज तिवारी सभी नरेंद्र लालचंद मेहता के लिए वोट माँगने के लिए यहाँ पर आए। इन सभी नेताओं की कोशिशें क्या यह सीट बचा पायी है यह भी दो दिनों में साफ हो जाएगा। अगर मेहता की माने तो भाजपा का जमीनी स्तर इतना मजबूत है कि उसके वोट कही और जा ही नही सकते।

निलबिंत नेता ही बनी भाजपा के सिरदर्द का कारण—-

लोकसभा के चुनाव में जिस तरह मीरा भायंदर ने एक सुर में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर सरकार बनाने के लिए वोट किया था उससे तो यही लग रहा था कि भाजपा की राह बहुत आसान होगी लेकिन गीता जैन जो कि भाजपा की ही पूर्व महापौर रही है उनके चुनावी रण में उतरने से शहर की राजनीतिक स्थिति एकदम से बदल गयी। लोगो का झुकाव जिस तरह से गीता जैन की तरफ था उससे इस बात से नकारा नही जा सकता कि गीता जैन अपक्ष उम्मीदवार होते हुए भी मीरा भायंदर में एक नया इतिहास रच सकती है।

पुराने आंकड़ो के भरोसे काँग्रेस अपनी जीत को लेकर निश्चिंत —-

काँग्रेस के नेता मुजफ्फर हुसैन कद्दावर नेताओं में से एक है और मीरा भायंदर की स्थिति को बखूबी समझते है।प्रचलित है कि काँग्रेस का वोटर कहीं और नही जाता और इसी बात को ध्यान में रखकर काँग्रेस यह दावा कर रही है कि पिछले लोकसभा चुनाव में तकरीबन 60 हज़ार के आसपास वोट उनके प्रत्याशी को मिले थे और वो सभी वोट काँग्रेस की ही झोली में गिरेंगे अब यह गणित कितना सच होता है यह तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा।

विशेषज्ञ की राय:- 

नेट्ज़क के डिरेक्टर और पत्रकार अमित तिवारी जो पूरे चुनाव को बहुत नजदीकी से ऑब्जर्व कर रहे थे उनकी माने तो राह किसी के लिए भी आसान नही है यह लडाई व्यक्तियों के बीच नही तो सिद्धान्तों के बीच की लड़ाई है।

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