दिव्यांगों को व्यावसायिक कार्यस्थलों पर सशक्त बनाने के लिए उठाने होंगे बड़े कदम

 

-प्रशांत खुल्लर-

चीफ ह्यूमन रिलेशन्स ऑफिसर, महिन्द्रा हॉलीडेज एंड रिसॉर्ट्स (इंडिया) लिमिटेड

समय भास्कर मुंबई ।  हम एक ऐसे दौर में रहते हैं, जहां एक अवधारणा के रूप में ‘समग्रता’ को कार्यस्थल सहित, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से लागू किया जा रहा है। हालांकि यह लगभग विरोधाभासी है कि जब दिव्यांग लोगों को रोजगार देने की बात आती है, तो भारत बहुत पीछे नजर आता है। 15 जून, 2017 तक सभी नियोक्ता संगठनों के लिए ‘समान अवसर नीति’ (ईओपी)

1- अपनाना अनिवार्य हो गया है, जिसमें कार्यस्थल पर दिव्यांग लोगों के लिए समग्रता की नीति के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं।

देश की समस्त कामकाजी आबादी का 2 प्रतिशत हिस्सा दिव्यांग लोगों का है।

2- यह एक महत्वपूर्ण संख्या है और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय नीति (2006)

3- यह स्वीकार करती है कि दिव्यांग लोग भी हमारे देश के लिए मूल्यवान मानव संसाधन हैं और उनके लिए एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाना चाहिए, जो उन्हें समान अवसर उपलब्ध कराए और उनके अधिकारों को संरक्षण प्रदान करे।

मानव संसाधन के रूप में, हमारे सामने चुनौती दो गुना है- एक, यह सुनिश्चित करना है कि संगठन इन कर्मचारियों को संभालने के लिए सभी मोर्चों पर सक्षम है और दूसरा, संसाधनों के इस पूल को मुख्य धारा में एकीकृत करने की दिशा में काम करना। पहला कदम एक ऐसा वातावरण बनाने से शुरू होता है जो समग्रता के लिए अनुकूल है और जहां दिव्यांग लोगों के लिए अनुकूल और बेहतर माहौल हो। इसमें प्रवेश और निकास बिंदुओं पर रैंप, ब्रेल में संकेत, ऊंचाई समायोज्य डेस्क, परिवहन सुविधा, टॉयलेट सुविधाएं आदि शामिल हैं।

इसके अलावा, एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सहकर्मियों को संवेदनशील बनाने के प्रयास किए जाएं और एक समावेशी कार्यस्थल बनाने की अवधारणा को आगे बढ़ाया जाए। एक दोस्ताना माहौल एक ऐसे संगठन में बेहद फायदेमंद हो सकता है जो दिव्यांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) को नियोजित करता है, जो न केवल उनके लिए एक अनुकूल मंच के रूप में काम कर सकता है, बल्कि यह सुनिश्चित करने में भी काफी मदद करेगा कि वे हाशिए पर नहीं हैं।

घोषित नीतियों के अनुसार, सरकार निजी क्षेत्र के ऐसे नियोक्ताओं को प्रोत्साहन, पुरस्कार और कर छूट प्रदान करती है जहां उनके कुल कर्मचारियों में से कम से कम 5 प्रतिशत कर्मचारी दिव्यांग हों। ध्यान रखने लायक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे सीएसआर की पहल के रूप में नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे व्यापार रणनीति के एक अभिन्न अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।

यह महत्वपूर्ण है कि शीर्ष प्रबंधन से लेकर समस्त कर्मचारियों तक सभी समर्थन, विश्वास और समावेश की संस्कृति के लिए प्रतिबद्ध हो। दिव्यांग लोगों को अपने कार्यस्थल पर समायोजित करना उतना मुश्किल नहीं है, जैसा कि यह नजर आता है। आतिथ्य जैसे क्षेत्रों, रसोई, संचालन, यहां तक कि फ्रंट ऑफिस में भी दिव्यांग लोगों का उपयोग किया जा सकता है।

यह उनके कौशल को पहचानने और उन्हें सही अवसर देने का सवाल है, ताकि वे भी सफलता हासिल कर सकें। यह सभी एक खुले दिमाग से शुरू होता है जो संसाधनों की प्रतिभा के उपयोग से शुरू होता है और जरूरी नहीं कि प्रतिभा एक कर्मचारी के पारंपरिक विवरण के अनुरूप हो। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह कर्म जैसा है – जितना अधिक आप समग्रता, संवेदनशीलता और करुणा की संस्कृति के प्रसार में निवेश करते हैं, उतना ही आप पारस्परिक रूप से प्राप्त करते हैं।

 

 

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