ऐसे तो रूकने से रही भुखमरी सरकार, सिस्टम व हम सब मिलकर ही रोक सकते हैं भुखमरी

डा. के पी सिंह, kpsinghagra78@gmail.com

भुखमरी के लिए आखिर जिम्मेदार कौन ? ग्लोबल हंगर इंडेक्स द्वारा जारी 2018 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के कुल भूखे रहने वाले व्यक्तियों में एक चौथाई लोग अकेले भारत में ही हैं । अनुमानित 20 करोड़ से ज्यादा लोग भारत में रोजाना भूखे पेट सोते हैं । इस वर्ष 119 देशों की जारी की गई सूची में भारत को 103 वां स्थान मिला है। विगत 10 वर्षों से भारत में भुखमरी लगातार बढ़ रही है। गंभीर चिंता का विषय यह भी है कि भारत उन 45 देशों में शामिल है जहां भुखमरी की स्थिति अत्यंत गंभीर है एशिया के नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका व बांग्लादेश जैसे गरीब देशों से हम भूख नियंत्रण में काफी बदतर स्थिति में हैं।

मानवता को झकझोर देने वाली एक घटना भारत में घटी जब भात मांगते हुए संतोषी ने भूख से दम तोड़ दिया था । हालांकि 2013 में भारत सरकार द्वारा फूड सिक्योरिटी का कानून पारित किया गया । लेकिन समय समय पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खाद्य सुरक्षा और भूख को लेकर केंद्र व राज्य सरकारों को निर्देश दिए जाते रहे हैं । इसके बावजूद भारत में प्रतिदिन 800 से ज्यादा बच्चे केवल भूख से दम तोड़ रहे हैं।आखिर भूख से हो रही इन मौतों का जिम्मेदार कौन है ? लापरवाह नागरिक व सिस्टम की नाकामी से पैदा भुखमरी ने देश की एक आबादी को मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है । मुख्यत: तीन कारण भुखमरी के लिए जिम्मेदार माने जा सकते हैं पहला रोजाना बर्बाद होता भोजन, दूसरा सरकारी गोदामों में सड़ता अनाज और तीसरा बढ़ती आबादी से घटता खेतों का आकार ।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ( एफ ए ओ ) की रिपोर्ट के आधार पर अकेले भारत में 244 करोड रुपए का भोजन रोजाना बर्बाद होता है । मतलब 1 साल में 90 हजार करोड रुपए का हम खाना बर्बाद कर रहे हैं। पिछले 10 वर्षों में भारत के सरकारी गोदामों में 7.80 लाख कुंतल अनाज सड़ा है । इस वर्ष ही कुल पैदावार 237.40 करोड़ कुंतल अनाज में से 12.48 करोड़ कुंटल अनाज खराब हुआ है । यह आंकड़ा बताता है कि लगभग रोजाना इतना अनाज सड़ रहा है कि जिससे लगभग चालीस हजार लोगों का पेट रोजाना भरा जा सकता है ।अगर हम खेतों की बात करें तो और भी भयावह स्थिति नजर आती है 1970-71 मैं खेतों का औसत आकार 2.28 हेक्टेयर था । बढ़ते परिवारों में बंटवारे के बाद 2015- 16 तक खेतों का औसत आकार 1.08 हेक्टेयर रह गया है । बढ़ती आबादी और बढ़ती शहर की सीमाओं ने भी कृषि उपज के खेतों को निगल लिया है । 2010 तक 189 फ़ीसदी बढ़ी ग्रामीण जनसंख्या के अनुपात में 194 फ़ीसदी टुकड़े खेतों के हुए हैं ।

रोजाना करोड़ों रुपयों का बर्बाद होता भोजन, रोजाना चालीस हजार लोगों का सड़ता भोजन और बढ़ती ग्रामीण आबादी से कम होती कृषि भूमि और शहरों का बढ़ता आकार। आखिर किस विकास की ओर हम अंधे होकर दौड़ रहे हैं ? जहां भारत के भविष्य के लिए एक वक्त का खाना तक उपलब्ध नहीं है। जिम्मेदारी अकेले सरकार की ही नहीं बल्कि हमारी भी बनती है कि हम गंभीरता पूर्वक भुखमरी के कारणों पर नियंत्रण करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दें। देश से भुखमरी को मिटाने में जितनी जिम्मेदारी सरकार व सिस्टम की है, उससे भी अधिक सामाजिक संस्थाओं और हम सब की है। हम सबके सामूहिक प्रयासों से भारत से भुखमरी मिटाई जा सकती है।

{ये लेखक के अपने विचार हैं}

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