क्रांति के साथ भ्रांति की जनक बनी सोशल मीडिया

डॉ. के पी सिंह

समाज में क्रांति के साथ भ्रांति की जनक । कुछ वर्ष पूर्व ऐसा लगता था कि सोशल मीडिया के आगे परंपरागत मीडिया अपने घुटने टेक देगा लेकिन परंपरागत मीडिया ने सोशल मीडिया के द्वारा किये बदलाव को स्वीकार कर अपने स्वरूप में परिवर्तन किया लेकिन वर्तमान में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सोशल मीडिया पर जिस प्रकार फेक न्यूज़ की बाढ़ आ रही है उस वजह से परंपरागत मीडिया को चुनौती देने में अभी सोशल मीडिया कमजोर है।

दिल्ली का निर्भया कांड , दिल्ली मैं केजरीवाल की सरकार को बनाने में, वर्ष 2013 दिल्ली में अन्ना हजारे का आंदोलन, मिस्र के तहरीर चौक का आंदोलन या ट्यूनीशिया के जैस्मिन रेवोलुशन के घटनाक्रम में सोशल मीडिया ने क्रांतिकारी भूमिका अदा की है। सोशल मीडिया पर विकीलीक्स ने तो समाचार विस्फोट की परंपरा को प्रारंभ किया है जो कि सोशल मीडिया द्वारा किया अभूतपूर्व योगदान है।

यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिससे यह साबित होता है कि सोशल मीडिया ने समाज में क्रांति की नींव डाली है। वहीं दूसरा पक्ष यह भी है कि सोशल मीडिया पर इस प्रकार की घटनाएं भी घटित हुई हैं जिन्होंने समाज में भ्रांति को बढ़ावा दिया उदाहरण के लिए 25 सितंबर 2011 को मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह को जीवित अवस्था में ही लाखों लोगों ने श्रद्धांजलि सोशल मीडिया पर दे दी जब सोशल मीडिया पर ही उनकी मृत्यु का गलत समाचार प्रसारित हो रहा था ।

इसी प्रकार मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ हुआ, इसी वर्ष नागपुर में हुए RSS के कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के फोटो को एडिट कर सोशल मीडिया पर डाल दिया गया । ऐसे कई मामले हैं जो समाज में भ्रांति पैदा कर रहे हैं । गाँधी, नेहरु व अन्य के फोटो एडिट कर तथ्यों से परे समाचार बनाकर सोशल मीडिया पर डाला जा रहा है। आगे निकलने की होड़ में सोशल मीडिया पर भेड़चाल शुरू हो गई है घटना की बिना जानकारी के ही लोग उसका अनुसरण करने लगे हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समाचारों के प्रसारण कि इस तीव्र गति ने समाचारों की सत्यता को कहीं पीछे छोड़ दिया है विगत कुछ वर्षों में यह देखने को मिला है कि सोशल मीडिया का दुरूपयोग राजनीतिक कार्यकर्ताओं के द्वारा एक संगठित रूप से किया जा रहा है। झूठे तथ्यों को परोस कर अथवा तथ्यों को तोड़ मरोड़कर सोशल मीडिया के द्वारा जनता के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है यह इतिहास के साथ खिलवाड़ है जिस के दुष्परिणाम आगे भविष्य में भुगतने होंगे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा मैं एक दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए झूठे तथ्यों को प्रस्तुत कर एक फर्जी इतिहास गढा जा रहा है । समाचारों के प्रसारण की तीव्रता ने तथ्यों को दूर धकेल दिया है सोशल मीडिया परंपरागत मीडिया से कहीं अधिक तीव्र गति से और जल्दी समाचारों को अपने पाठकों तक पहुंचा देती है।

सोशल मीडिया परंपरागत मीडिया से मुख्यतः दो बिंदुओं पर बिल्कुल अलग है पहला परंपरागत मीडिया में पाठक ना तो अपनी मान मर्जी की सामग्री जारी कर सकता है और ना ही उसमें कोई फेरबदल कर सकता है। लेकिन साइबर मीडिया में इस प्रकार का कोई बंधन नहीं है क्योंकि उस पर कोई सरकारी अथवा सामाजिक नियंत्रण नहीं है। सोशल मीडिया पर तत्काल प्रतिक्रिया की सुविधा ने अपने क्षेत्र में व्यापक रूप से वृद्धि की है। दूसरा भाषा की मर्यादा तार-तार हो गई है। सोशल मीडिया ने गाली गलौज और असभ्य भाषा को समाहित कर लिया है जिसके परिणाम स्वरुप सोशल मीडिया की गरिमा नष्ट हो रही है। वहीं परंपरागत मीडिया में भाषा का आचरण बना हुआ है।

सोशल मीडिया ने उन राजनीतिक दलों को भी अपने सामने घुटने टेकने को मजबूर कर दिया जो कभी इंटरनेट और कंप्यूटर का विरोध किया करती थी दूसरी तरफ सोशल मीडिया के कारण ही परंपरागत मीडिया को अपने संस्करण इंटरनेट पर उपलब्ध कराने के लिए मजबूर होना पड़ा है क्योंकि आज का युवा पूरी दुनिया के संपर्क में रहना चाहता है और तत्काल दुनिया में कहीं भी घट रही घटनाओं की जानकारी प्राप्त करना चाहता है जो कि सोशल मीडिया पर ही संभव है। अ

गर भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो राजनैतिक दलों की रस्साकशी में सोशल मीडिया के प्रयोग और उद्देश्य में बदलाव आ रहा है और यह बदलाव चुनावों के मौसम में अपने चरम पर होता है यहां यह अनुमान लगाना चुनौती भरा होता है कि सोशल मीडिया की किस बात पर भरोसा किया जाए । अनेक ऐसे उदाहरण है। जिसके फलस्वरूप समाज में यह धारणा पनप रही है कि सोशल मीडिया ने क्रांति के साथ साथ भ्रांति को भी पैदा किया है। भरोसे की कसौटी पर खरी उतरने वाली कई वेबसाइट हैं जो तथ्यात्मक समाचार अथवा जानकारियां प्रदान करती हैं इनके साथ साथ फेक न्यूज का भंडार रखने वाली सैकड़ों वेबसाइटो का जाल सोशल मीडिया पर बिछा हुआ है जो कि पैसे के लालच में मनगढ़ंत और झूठी जानकारियां अथवा समाचार समाज को परोस रहे हैं और सोशल मीडिया को भ्रांति का मीडिया बना रहे हैं।

(ये लेखक के अपने विचार है)

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