समाज केवल व्यक्तियों का समूह ही नहीं, अपितु एक जीवन्त स्वायत्त सत्ता: द्विवेदी

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा विद्यार्थियों के बहुमुखी विकास को दृष्टिगत रखते हुए सामान्य अभिरुचि के विविध पक्षों पर एक विशिष्ट व्याख्यान श्रृंखला आयोजित की जाती है। इस कड़ी के आरम्भिक व्याख्यान अटल जी और भारतीय शिक्षा, अटल जी और भारतीय अर्थव्यवस्था, अटल जी एवं संचार क्रान्ति, आयुर्वेद एवं स्वास्थ्य, अटल जी और ऑस्टियोआर्थराइटिस, अटल जी एवं भारतीय संस्कृति, प्रकृति संरक्षण पर्यावरण प्रदूषण, अटल जी का कविता संसार सदृश  विषयों पर आयोजित किये जा चुके हैं। लविवि के भूगर्भशास्त्र विभाग स्थित केपी विमल सभागार में अटल जी राष्ट्रचेतना की प्रतिमूत्र्ति विषय पर सर्वेश चन्द्र द्विवेदी, प्रभारी निदेशक, राष्ट्रधर्म प्रकाशन, लखनऊ ने व्याख्यान दिया।

श्री द्विवेदी ने कहा कि समाज केवल व्यक्तियों का समूह ही नहीं, अपितु एक जीवन्त स्वायत्त सत्ता है। भूमि-विशेष के प्रति मातृभाव रखकर चलने वाला समाज, जिसमें बन्धुभाव हो, राष्ट्र बनता है। उन्होंने कहा कि हमारा विचार-दर्शन संघर्ष व स्पर्धावादी नहीं, वरन पूरकतावादी, सामंजस्य, समन्वय, संस्कारवादी है। सम्पत्ति के विषय में न्यासी का भाव और विश्व को एक कुटुम्ब की भावना से देखना भारत की दृष्टि रही है। भारत भूमि कर्मभूमि व देवभूमि ह,ै शेष विश्व भोग-भूमि है।  दरिद्र नारायण की सेवा हमारा कत्र्तव्य है।

इन सभी भावों से अटल जी पूर्ण थे। व्याख्यान का विषय प्रवर्तन करते हुए डा. बृजेन्द्र पान्डेय ने कहा कि अटल जी का दौर स्वतंत्र भारत की राजनीति में एक ऐसे हस्तक्षेप के रूप में दिखायी देता है जब एक ऐसा राजनीतिक विकल्प देश को प्राप्त होता है जिसमें देश के सम्पूर्ण राष्ट्रबोध को एक बहुप्रतीक्षित नई दृष्टि से देखने का अवकाश प्राप्त होता है। कार्यक्रम के संयोजक प्रोफेसर ध्रुवसेन सिंह ने कहा की अटल जी के जीवन एवं समाज के सारे परंपरागत एवं नवीन विषयो को अपनी कविता का विषय बनाया है अत: उनकी कविताएं समाज एवं संस्कृति के सारे आयामों पर अपने विचार प्रदर्शित करती है। इस अवसर पर हास्य कवि पंकज प्रसून, कार्यकारी कुलपति प्रो. यूएन द्विवेदी, प्रो. पीसी मिश्रा, प्रो. एके शर्मा, प्रो. आर बली, प्रो. केके अग्रवाल, डॉ नीरज जैन, डॉ. बृजेंद्र पांडेय, डॉ. पुनीत मिश्रा, डॉ. अजय आर्य प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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