अयोध्या मामले की सुनवाई 14 मार्च से , अंसारी बोले- अभी पेपर कंप्लीट नहीं!

नई दिल्ली । अयोध्या मामले की सुप्रीम कोर्ट में बुधवार 14 मार्च से सुनवाई शुरू हो रही है। इसे लेकर दोनों ही पक्ष उम्मीद लगाए हुए हैं, लेकिन मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी का कहना है कि अभी पेपर ही कंप्लीट नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हम लोग चक्कर लगा रहे हैं और चाहते हैं कि इसका फैसला जल्द से जल्द हो। बकौल अंसारी, मामले का जितनी जल्दी फैसला आ जाएगा, उतना अच्छा रहेगा, ताकि मामला जल्द से जल्द खत्म हो। मामला हिंदू-मुसलमानों की आस्था का है और सारे सबूत हमारे पास हैं। मस्जिद 500 वर्ष पुरानी थी। उसके अंदर भगवान की मूर्तियां रखी गई हैं। उन्होंने कहा कि हम राम के विरोधी नहीं हैं।

हम यह नहीं बता सकते कि फैसला कब आएगा, लेकिन हमें पूरी उम्मीद है कि आस्था की बुनियाद पर फैसला नहीं होगा, सबूतों के बुनियाद पर फैसला होगा और सबूत में हमारे पास है। इससे पहले, आठ फरवरी को अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई हुई थी। इस दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर की पीठ में सभी पक्षों ने दस्तावेजों के जरिए अपना पक्ष रखा था।

सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपक मिश्रा ने साफ किया था कि वह इस मामले को जमीन विवाद के तौर पर देखेंगे। कोर्ट ने सभी पक्षों को दो हफ्ते में दस्तावेज तैयार करने का आदेश दिया था। साथ ही कोर्ट ने साफ किया था कि इस मामले में अब कोई नया पक्षकार नहीं जुड़ेगा।

मामले की अगली सुनवाई अब आज होनी है। खबरों के अनुसार कोर्ट ने प्रक्रियात्मक जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी पक्षों को दो हफ्ते का समय दिया गया है। अब मामले की फुल सुनवाई शुरू होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह इस मामले में पहले मुख्य पक्षकारों निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की दलीलें सुनेगा, लेकिन राजनीतिक और भावनात्मक दलीलें नहीं सुनी जाएंगी।

दरअसल एक पक्ष ने कहा था कि कोर्ट 100 करोड़ हिंदुओं की भावनाओं का ध्यान रखे। उल्लेखनीय है कि इस मामले से जुड़े 9,000 पन्नों के दस्तावेज और 90,000 पन्नों में दर्ज गवाहियां पाली, फारसी, संस्कृत, अरबी सहित विभिन्न भाषाओं में हैं, जिस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कोर्ट से इन दस्तावेजों को अनुवाद कराने की मांग की थी।

राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था। इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर-2010 को अयोध्या टाइटल विवाद में फैसला दिया था। फैसले में कहा गया था कि विवादित भूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाए। जिस जगह रामलला की मूर्ति है, उसे रामलला विराजमान को दिया जाए। सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए, जबकि बाकी का एक तिहाई भाग सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाए। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया।

अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान और हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। वहीं, दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल कर दी। इसके बाद इस मामले में कई और पक्षकारों ने याचिकाएं लगाईं। सुप्रीम कोर्ट ने नौ मई-2011 को इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले की सुनवाई करने की बात कही थी। सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पेंडिंग है। agency

Loading...

more recommended stories